भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 284

सीहकोत्थुक ] २६१ यं सुपण्णो सुपण्णेन देवो देवेन मन्तये किं तेत्थ चतुमट्ठस्स बिलं पविस जन्तुक ॥ [ पक्षी पक्षी के साथ, देवता देवता के साथ मन्त्रणा करे तो हे चारो दोषो से युक्त गीदड तुझे क्या ? तू बिल में जा । ] ——— सुपण्णो सुन्दर पङ्ख, सुपण्णेन दूसरे हस-बच्चे के साथ । देवो देवेन उन दोनो को ही देवता करके कहता है। चतुमट्ठस्स शरीर से, जाति से, स्वर से तथा गुण से—इन चारो से मृष्ट वा शुद्ध यही शब्दार्थ है; किन्तु भावार्थ है अशुद्ध। लेकिन उसे प्रशंसा के बहाने निन्दा करते हुए यह कहा—चारो बुराइयो वाले तुझ गीदड़ को यहाँ क्या ? यही मतलब है। बिलं पविस बोधिसत्त्व ने डर दिखा उसे भगाते हुए यह कहा । ——— शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। बूढ़ा उस समय का शृगाल था। दो हस-बच्चे सारिपुत्र-मौद्गल्यायन थे। वृक्षदेवता तो मैं ही था। १८८. सीहकोत्थुक जातक “सीहङ्गुली सीहनखो....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कोकालिक (भिक्षु) के बारे में कही ! क. वर्तमान कथा एक दिन दूसरे बहुश्रुत भिक्षुओ के धर्म बांचते समय कोकालिक की भी धर्म वाँचने की इच्छा हुई—इस प्रकार सारी कथा उक्त प्रकार से ही विस्तार