जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमणिचोर ] २८५ १९४. मणिचोर जातक "न सन्ति देवा पयसन्ति नून..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय वध का प्रयत्न करने वाले देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस समय शास्ता ने यह सुन कर कि देवदत्त मेरे वध के लिए प्रयत्न करता है, 'भिक्षुओ, न केवल अभी, पहले भी देवदत्त ने मेरे वध का प्रयत्न किया ही है, लेकिन सफल नहीं हुआ" कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व वाराणसी के समीप के एक गामड़े में गृहपति कुल में पैदा हुए। उसके बड़े होने पर उसके लिए वाराणसी से एक लड़की लाई गई। वह प्रिया थी, सुन्दर थी, दर्शनीय थी देवाप्सराओं के समान वा पुष्पित लता के समान। वह मस्त किन्नरी की तरह क्रीडा करने वाली थी। नाम था सुजाता। पतिव्रता थी; सदाचारिणी थी और थी कर्त्तव्यपरायणा। पति की सेवा तथा सास ससुर की सेवा वह नित्य करती थी। वह बोधिसत्त्व को प्रिय थी, मन के अनुकूल थी। वे दोनो प्रसन्नतापूर्वक एक चित्त हो मेल से रहते थे। एक दिन सुजाता ने बोधिसत्त्व से कहा—मैं मातापिता को देखना चाहती हूँ। उसने कहा—भद्रे ! अच्छा पर्याप्त पाथेय तैयार करो। खाद्य-पक्वान पक्वा, खाद्य आदि गाड़ी पर रखवा, गाड़ी को हाँकता हुआ वह स्वयं आगे बैठा। वह पीछे बैठी। नगर के समीप पहुँच गाड़ी खोल नहा कर उन्होने खाया। फिर बोधिसत्त्व ने गाड़ी जोती और स्वयं आगे बैठा।