जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० [ २.५.१६५ यदि सहन करने योग्य होगा तो सहन कर लूंगा; नही सहन करने योग्य होगा तो नही सहन करूँगा।" उसने बोधिसत्त्व को बुला, आसन दे पूछा— "पण्डित ! प्रश्न पूछता हूँ।" "महाराज ! पूछें, उत्तर दूँगा।" राजा ने प्रश्न पूछते हुए यह पहली गाथा कही— पब्बतूपत्थरे रम्मे जाता पोक्खरणी सिवा तं सिगालो अपापासि जानं सीहेन रक्खितं ॥ [ पर्वत के रम्य दामन में सुन्दर पुष्करिणी रही। यह जानते हुए भी कि इसे सिंह ने अपने लिए सुरक्षित रखा है, उसमें शृगाल ने पानी पिया। ] पब्बतूपत्थरे हिमालय पर्वत के दामन में फैले हुए आँगन में जाता पोक्ख- रणी सिवा, शीतल, मधुर जल वाली पुष्करिणी पैदा हुई। कमल से ढकी हुई नदी भी पुष्करिणी ही। अपापासि, अप उपसर्ग है अपासि अर्थ है। जानं सीहेन रक्खितं यह पुष्करिणी सिंह के परिभोग की है, सिंह के द्वारा रक्षित है; उस शृगाल ने यह जानने हुए ही कि यह सिंह द्वारा रक्षित है जल पिया ! तू क्या समझता है ? शृगाल सिंह का भय न मान कर इस प्रकार की पुष्करिणी से जल पिए ? बोधिसत्त्व ने यह समझ कर कि निश्चय से इसके रनिवास को किसी अमात्य ने दूषित किया होगा, दूसरी गाथा कही— पिपन्ति वे महाराज ! सापदानि महानदिं न तेन अनदी होति खमस्सु यदि ते पिया ॥ [ महाराज ! महानदी पर सभी प्राणी जल पीते हैं। उससे नदी अनदी नही होती। यदि वह प्रिया है, तो क्षमा करें। ] सापदानि न केवल गीदड ही किन्तु चीते, कुत्ते, खरगोश, बिल्ले, हिरन आदि सभी प्राणी कमल से ढकी हुई होने के कारण पुष्करिणी कहलाने वाली