जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ेंयालाहस्स ] २६३ कल्याणि (नदी) और इधर नाग द्वीप—इन दोनो के बीच में समुद्र तट पर घूमती। यही उनका स्वभाव था। एक दिन पाँच सौ ऐसे व्यापारी जिनकी नौकाएँ टूट गई थी, उनके नगर के पास उतरे। वे उनके पास गईं और उन्हें लुभा कर यक्ष-नगर ला पहले जिन आदमियो को पकड़ा था, उन्हे जादू की ज़जीर में बांध कारा-गृह में डाल दिया। ज्येष्ठ यक्षिणी ने ज्येष्ठ व्यापारी को शेष यक्षिणियो ने शेष व्यापारियो को, इस प्रकार उन पाँच सौ यक्षिणियो ने पाँच सौ व्यापारियो को अपना पति बनाया। वह ज्येष्ठ यक्षिणी रात को जिस समय व्यापारी सोए रहते उठ कर जा कारा-गृह मे आदमियो को मार उनका मास खाकर आती। बाकी भी उसी तरह करती। ज्येष्ठ यक्षिणी जिस समय मनुष्य-मास खाकर लौटती उसका शरीर ठंडा होता। ज्येष्ठ व्यापारी ने उसका स्पर्श किया तो उसे पता लगा 'कि यह यक्षिणी है। उसने सोचा यह पाँच सौ भी यक्षिणियां ही होगी। हमें भागना चाहिए। अगले दिन प्रात काल ही मुंह धोने जाकर उसने बाकी व्यापारियो को कहा—"यह मानवी नही है। यह यक्षिणियां है। दूसरे नौका-टूटे व्यापारियो के आने पर उन्हें स्वामी बना हमें खा डालेंगी। हम यहाँ से भागें।" उनमें से ढाई सौ बोले—"हम इन्हे नही छोड़ सकते। तुम जाओ। 'हम नही भागगे।" ज्येष्ठ व्यापारी अपनी बात मानने वाले ढाई सौ जनो को ले उनसे डर कर भाग गया। उस समय बोधिसत्त्व बादल-अश्व की योनि में पैदा हुए थे। सारा रग श्वेत । सिर कौए जैस। बाल मूंज के से। ऋद्धिमान। आकाशचारी। वह हिमालय से आकाश में चढ कर ताम्रपर्णी द्वीप जा वहाँ ताम्रपर्णी तालाव के कीचड मे अपने से उगे हुए धान खाकर लौटता। इस प्रकार जाते हुए वह दया से प्रेरित हो तीन बार मानुषी-वाणी बोलता—"कोई जनपद जाने वाला है ? कोई जनपद जाते वाला है?" उन्होने उसकी बात सुन, पास जा हाथ जोड कर कहा—"स्वामी ! हम नपद जाएँग।' ४