भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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मित्तामित्त ] २६५ धरेंगे। वालाहेनेय वाणिजा यादत के घोडे के 'श्रामो' कहने पर उसरा कहना मानने वाले व्यापारियों की तरह। जैसे वह समुद्र पार जाकर अपने अपने स्थान पर पहुँच गए; उसी प्रकार बुद्धो या उपदेश मानने वाले संसार को पार कर निर्वाण को प्राप्त होते है। अमृत महानिर्वाण से धर्मदेशना को समाप्त किया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उत्कण्ठित-चित्त भिक्षु स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। और भी बहुतो को स्रोतापत्ति, सकृदागामी, अनागामी तथा अर्हत् फल प्राप्त हुआ। उस समय बादल अश्व-राज था। कहना मानने वाले ढाई सौ व्यापारी बुद्ध-परिषद थे। बादल अश्व-राज तो मैं ही था। १६७. मित्तामित्त जातक “न नं उम्हयते दिस्वा....” यह शास्ता ने श्रावस्ती में विहार करते समय एक भिक्षु के बारे में कही— क. वर्तमान कथा एक भिक्षु ने यह समझ कि मेरे ले लेने पर मेरा उपाध्याय बुरा नही मानेगा, विश्वास कर उसके रखे हुए एक वस्त्र-खण्ड को ले उससे जूता रखने की थैली बना ली। पीछे उपाध्याय को कहा। उपाध्याय ने पूछा—"क्यो लिया ?” “मेरे लेने से आप क्रोधित नहीं होंगे; आपका ऐसा विश्वास करके।”