भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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राय ] २६१ उसे बुझाकर, झाने पर पटक दिया। फिर 'तू मुझे उपदेश देता है। अपनी हैसियत नहीं देखता ?' वह, गरदन मरोड मारकर चूल्हे में फेंक दिया। ब्राह्मण ने लौट कर, विश्राम से बोधिसत्त्व से कहा—"तात राय ! तुम्हारी माता भ्रष्टाचार करती थी या नहीं करती थी ?" पूछते हुए यह पहली गाथा कही— पवासा आगतो तात ! इदानि न चिरागतो, कच्चिन्नु तात ! ते माता न अञ्ञमुपसेवति ॥ [ तात ! मैं अब प्रवास से लौट आया हूँ। मैं अभी आ रहा हूँ। तात ! क्या तेरी माता दूसरे पुरुष का सेवन करती थी ? ] मैं तात पवासा आगतो, यह मैं अभी आया हूँ। न चिरागतो, इसीसे समा- चार न जानने के कारण पूछता हूँ। कच्चिन्नु तात ते माता अञ्ञं पुरुष को न उपसेवति ? राय ने 'तात ! पण्डित सत्य या असत्य असत्यानाकार बात कभी नहीं कहते' प्रकट करते हुए दूसरी गाथा कही— न खो पनेतं सुभणं गिरं सच्चमसङ्कितं, शयेय पोट्ठपादोव मुम्मुरे उपकूलितो ॥ [ यह सच्ची बात सुभाषित वाणी नहीं है; बिगरे कहने से पोट्ठपाद की तरह गर्म राख में भुने । ] • गिरं वचन। यथा को ही जैसे अब 'गिरा' कहते हैं वैसे ही तब 'गिरं' कहते थे। तोला-बच्चा सिद्ध का ख्याल न कर ऐसा कहता हूँ। लेकिन इसका अर्थ यह है—तात ! पण्डित लोग सच्ची, यथार्थ, तथ्य-युक्त स्वाभाविक बात भी असत्याकार होने से न सुभणं। असत्याकार सच्ची बात कहने से सयेय पोट्ठपादोव मुम्मुरे उपकूलितो जैसे पोट्ठपाद गरम राख में भुना हुआ सोता है; उस प्रकार सोए। उपकूलितो पाठ का भी यही अर्थ है।