भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 316

गहपति ] ३०१ मे दाना पडा। सारे ग्रामवासियो ने मिलकर निश्चय किया कि अब से दो महीने बाद खेत काटकर धान दे देंगे, और गाँव के मुखिया से एक बूढ़ा बैल ले उसका मास खा गए। एक दिन गाँव का मुखिया मौका देख, जिस समय बोधिसत्व बाहर गया था घर में घुसा। उनके सुख से लेटने के समय ही बोधिसत्व ग्राम-द्वार से प्रविष्ट हो घर की ओर हो लिया। ग्राम-द्वार की ओर देखते हुए उस स्त्री ने सोचा, 'यह कौन है ?' फिर देहली पर खडे होकर देखने से जब उसे निश्चय हुआ कि यह वही है, तो उसने मुखिया से कहा। गाँव का मुखिया डर के मारे काँपने लगा। उसने कहा—डर मत। एक उपाय है। हमने तेरा दिया गोमास खाया है। तू मांस का मूल्य उगाहने वाले की तरह हो। मैं कोठे पर चढ काठ के द्वार पर खडी हो कहती हूँ कि धान नहीं है। तू घर के बीच म खडा होकर बार बार उलाहना दे—'हमारे घर मे बच्चे भूखे हैं। मेरे मांस का मूल्य दो।' इतना कह वह कोठे पर चढ कोठे के दरवाजे पर बैठी। मुखिया घर में खडा हो कहने लगा—मांस की कीमत दो। वह कोठे के दरवाजे पर बैठ कहती— धान नहीं है। खेत कटने पर देंगे। जा। बोधिसत्व ने घर में प्रवेश कर उनकी करतूत देख समझ लिया कि इस पापिन ने यह ढग बनाया होगा। उसने गाँव के मुखिया को बुलाकर कहा— "हे ग्राम-भोजक ! हमने तेरे बूढे बैल का मास खाते समय, 'अब से दो महीने बाद धान देंगे' कहकर मास खाया था। अभी आधा महीना भी नहीं गुजरा। तू अभी से क्यो धान लेना चाहता है ? लेकिन तू इस उद्देश्य से नही आया, दूसरे ही उद्देश्य से आया होगा ? मुझे तेरी करतूत अच्छी नही लगती। यह भी दुराचारिणी पापिन जानती है कि कोठे में धान नहीं है। वह अब कोठे पर चढ कहती है—धान नही है। तू भी कहता है—दे। मुझे दोनो की बात अच्छी नही लगती।" इस भाव को प्रकट करते हुए बोधिसत्त्व ने यह गाथाएँ कही— उभयम्मे न खमति उभयम्मे न रुच्चति, या चाय कोट्ठमोतिण्णा न दस्स इति भासति ॥