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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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साधुसील ] ३०३ शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित किया। सत्यों के अन्त में उत्कण्ठित चित्त भिक्षु सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय ग्राम के मुखिया को ठीक करने वाला गृहपति में ही था।

२००. साधुसील जातक

“सरीरदप्प ” यह शास्ता ने जेतवन म विहार करते समय एक ब्राह्मण के बारे में कही।

क वर्तमान कथा

उस ब्राह्मण की चार लड़कियाँ थीं। व चार प्रकार के आदमियों को चाहती थीं। उनमें से एक सुन्दर शरीर वाले को, एक आयु में बड़े को, एक (ऊँची) जाति वाले को और एक सदाचारी को। ब्राह्मण सोचने लगा ' लड़कियों को (पराए) घर भेजते हुए, उनका विवाह करते हुए उन्हें किसे देना चाहिए ? क्या रूपवान् को ? क्या आयु म बड़े को ? क्या जाति में बड़े को अथवा सदाचारी को ? ' जब सोचने पर भी वह कुछ निश्चय न कर सका तो उसने विचार किया कि इस बात को सम्यक् सम्बुद्ध जानेंगे। उन्हें पूछ कर, इन चारों में जिसे देना उचित होगा उसे दूंगा। वह गन्धमाला आदि लिवा कर विहार गया, शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। उसने आरम्भ से सब बात सुना कर पूछा— “भन्ते ! इन चार जनों में से किसे देना उचित है ?” शास्ता ने कहा— “पहले भी पण्डितों ने तेरे इस प्रश्न का उत्तर दिया था। लेकिन वह पूर्व-जन्म की बात होने से तू उसे नहीं जान सकता।” ऐसा कह उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही।

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