भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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३१० [ २.६.२०२ चीवर के सिरे से पकड, हाथो से पकड, सिर से पकड, नाक को रगढ, कान पकड घसीटते हुए, हाथ से गुदगुदी उठाते हुए पात्रचीवर सौंप शास्ता के पास गए। वहाँ शास्ता को प्रणाम कर बैठे। शास्ता ने मधुर-वाणी से कुशल क्षेम पूछा। तब वे बोले— भन्ते ! लकुण्टक भद्दिय नाम के आपके एक शिष्य स्थविर मधुर भाषी धर्मोपदेशक है। वह इस समय कहाँ है ? "भिक्षुओ, क्या उसे देखना चाहते हो ?" "भन्ते ! हाँ।" "भिक्षुओ, जिसे तुम द्वार-कोठे पर देख, चीवर के कोने आदि से पकड हाथ से छेडते हुए आए, वही यह है।" "भन्ते ! इस तरह का प्रार्थी,१ इस तरह का उच्चाभिलाषी२ किस कारण से इतने छोटे आकार का पैदा हुआ ?" "अपने पूर्व-कृत पापकर्म के कारण।" उनके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व देवेन्द्र शक्र हुए। उस समय ब्रह्मदत्त जीर्ण जरा-प्राप्त हाथी, घोडे वा बैल को नही देख सकता था; देखते ही क्रीडा करने की इच्छा से उसका पीछा करता था। पुरानी गाडी देख कर तुडवा देता, वृद्ध स्त्रियो को देख, उन्हें बुलवा, उनके पेट पर प्रहार दिलवा, उन्हें गिरवा, फिर उठवा डरवाता। वृद्ध आदमियो को देख बाजीगर की तरह कलाबाजियाँ खिलवाता। न दिखाई देने की अवस्था में यदि यह सुन भी लेता कि अमुक घर में वृद्ध मनुष्य है, तो उसे बुलवा कर खेलता। मनुष्य लज्जित होकर अपने अपने माता पिता को विदेशो में भेजने लगे। माता की सेवा, पिता की सेवा का कर्तव्य छूटने लगा। राजसेवक भी क्रीडा- १ जिसने पूर्व-बुद्धों के पास प्रार्थना की। २ जिसने पूर्व-जन्म में ऊँची अभिलाषा से सत्कर्म किए।