जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१४ [ २.६.२०३ प्रति मैत्री भावना करो, तो तुम्हें सर्प नहीं डसेंगे। अब से चारो सर्पराज-कुलों के बारे में इस प्रकार मैत्री भावना करो।" इतना कह यह गाथा कही— विरूपक्खेहि मे मेत्तं मेत्तं एरापथेहि मे, छब्यापुत्तेहि मे मेत्तं मेत्तं कण्हागोतमकेहि च ॥ [ विरूपक्खो के प्रति मे मैत्री-भाव रखता हूँ; एरापथों के प्रति भी मेरी मैत्री है। छब्यापुत्रो के प्रति मेरी मैत्री है और मैत्री है कण्हागोतमो के प्रति ] . विरूपक्खेहि मे मेत्तं, विरूपक्ख नागराज-कुल के प्रति मेरा मैत्री-भाव है। एरापथ आदि में भी इसी प्रकार। यह एरापथ नागराज-कुल, छब्यापुत्त नागराजकुल और कण्हागोतम नगराज-कुल भी नागराज-कुल ही हैं। इस प्रकार चार नागराज-कुल दिखाकर कहा कि यदि तुम इनके प्रति मैत्री-भावना कर सको तो तुम्हें सर्प नहीं डसेंगे, कष्ट नहीं देंगे।, इतना कह दूसरी गाथा कही— अपादकेहि मे मेत्तं मेत्तं दिपादकेहि मे, चतुप्पदेहि मे मेत्तं मेत्तं बहुप्पदेहि मे ॥ [ जिनके पैर नहीं हैं उनसे मेरी मैत्री है, जिनके दो पैर हैं उनसे मेरी मैत्री है, जिनके चार पैर हैं उनसे मेरी मैत्री है और जिनके अनेक पैर है उनसे मेरी मैत्री है।] पहले पद से विशेष रूप से सभी पैर-रहित सर्पों तथा मछलियो के प्रति मैत्री-भावना कही गई। दूसरे पद से मनुष्यो तथा पक्षियो के प्रति। तीसरे से हाथी घोड़े आदि सभी चतुष्पदों के प्रति। चौथे पद से बिच्छु, गूजर, कीडे मकोड़े, मकडी आदि के प्रति।