जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 334, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ेंखन्धवत्त ] ३१७. कता मे रक्खा कता मे परित्ता, पटिक्कमन्तु भूतानि सोहं नमो भगवतो; नमो सत्तन्न सम्मासम्बुद्धानं ॥ [ मैने अपनी हिफाजत कर ली; मैने अपना परित्राण कर लिया। (हानि- कर) जीव दूर हों। मै भगवान् (बुद्ध) को और सात सम्यक् सम्बुद्धो१ को प्रणाम करता हूँ । ] कता मे रक्खा, रत्नत्रय का गुणानुस्मरण कर मैने अपनी रक्षा, हिफा- जत कर ली। कता मे परित्ता मैने अपना परित्राण भी कर लिया। पटिक्कमन्तु भूतानि, मेरा अहित चिन्तन करने वाले प्राणी चले जाएँ, दूर हों। सोहं नमो भगवतो, सो मै इस प्रकार अपनी रक्षा कर पूर्व के परिनिर्वाण को प्राप्त हुए बुद्ध भगवान् को नमस्कार करता हूँ। नमो सत्तन्न सम्मासम्बुद्धानं, विशेष रूप से अतीत के क्रम से परिनिर्वाण को प्राप्त हुए सात बुद्धो को नमस्कार करता हूँ । इस प्रकार नमस्कार करते हुए भी सात बुद्धो का अनुस्मरण करो, (करके) बोधिसत्त्व ने ऋषिगण को यह परित्राण-धर्मदेशना रच कर दी। आरम्भ में दो गाथाओ द्वारा चारो सर्पराज कुलो में मैत्री-भावना प्रकट की होने से, विशेष रूप से तथा सामान्य रूप से दोनो मैत्री-भावनाएँ प्रकट की होने से, यह परित्राण धर्मदेशना यहाँ दी गई है। और कारण खोजना चाहिए। उस समय से ऋषियो का समूह बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार चल मैत्री- भावना करने लगा। बुद्ध के गुणो का स्मरण करने लगा। इस प्रकार उनके बुद्ध-गुणो का स्मरण करने ही पर सब सांप चले गए। बोधिसत्त्व भी ब्रह्म- विहारो की भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल वैठाया। उस समय ऋषि-गण बुद्ध परिषद थी। गण का शास्ता तो मै ही था। १ देखो महापदान सूत्र (दीर्घनिकाय) ।