भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 348

अस्सक ] ३२६ [परस्पर एक दूसरे की कामना करते हुए अपने प्रिय पति इस अस्सक राजा के साथ मैंने इस प्रदेश में विचरण किया। नए सुख दुःख से पुराना सुख दुःख ढक जाता है। इसलिए अस्सक राजा की अपेक्षा यह कीड़ा ही मेरा अधिक प्रिय है।] अयमस्सकराजेन देसो विचरितो मया इस रमणीय उद्यान प्रदेश में पहले मैंने अस्सक राजा के साथ विचरण किया। अनुकामयानुक़ामेन; अनु निपात मात्र है। मैं उसकी कामना करती, वह मेरी कामना करता। इस प्रकार परस्पर कामना करते हुए के साथ। पियेन उस जन्म में प्रिय। नयेन सुखदुक्खेन पोराणं अपिधीयति, भन्ते ! नए सुख से पुराना सुख नए दुःख से पुराना दुःख ढक जाता है। यही लोक-स्वभाव है—प्रगट करती है। तस्मा अस्सकरञ्ञाय कीटो पियतरो मम; क्योंकि नवीन से पुराना ढक जाता है इसलिए अस्सक राजा की अपेक्षा कीड़ा मुझे सौ गुणा प्रिय है। इसे सुन अस्सक राजा को पश्चात्ताप हुआ। उसने वहाँ खड़े ही सड़े लाश निकलवा सिर से स्नान कर बोधिसत्व को प्रणाम किया। फिर नगर में प्रवेश कर दूसरी पटरानी बना धर्म से राज्य करने लगा। बोधिसत्त्व भी राजा को उपदेश दे शोक-रहित कर हिमवन्त चले गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों के अन्त में उत्कण्ठित (भिक्षु) सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। • उस समय उव्वरी पूर्व-भार्य्या थी। अस्सक राजा उत्कण्ठित भिक्षु था। माणवक सारिपुत्र। तपस्वी तो मैं ही था। *

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 348, कुल 479 में से · BharatKosha