भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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थक्कर ] ३३३ करता था। सर्दी-गर्मी से शरीर को कष्ट होगा, इस डर से बाहर नही निक- लता था। बहुत पक्का या जला भात नहीं खाता था। उसकी यह शरीर- रक्षा की होशियारी सघ में प्रकट हो गई। धर्मसभा में भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अमुक तरुण शरीर-रक्षा के काम में होशियार है। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? “यह बातचीत” कहने पर ‘भिक्षुओ ! यह तरुण अपने शरीर-रक्षा के काम में न केवल अभी होशियार है, पहले भी होशियार था।’ इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व काल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व जगल में वृक्ष-देवता हुए। एक चिडीमार पालतू बटेर, वालो का फदा तथा लाठी से जगल में बटेरो को फँसाता हुआ, भाग कर जगल में चले गए एक बटेर को फाँसने लगा। यह चाल के फदे म होशियार होने के कारण फद में नही आता था। वह उठ उठ कर छिप जाता। शिकारी अपने आपको शाखा-पत्तो से ढक बार बार लकडी और फदा लगाता। बटेर ने उसे लज्जित करने के लिए मानुषी भाषा बोलते हुए पहली गाथा कही— दिट्ठा मया वने रुक्खा अस्सकण्णविभीटका, न तानि एव सक्कन्ति यथा त्वं रुक्ख सक्कसि ॥ [ मैने इस वन के अनेक अस्सकण्ण (अश्वकर्ण) और विभीटका (विभीतक) वृक्ष देखे, लेकिन तू वृक्ष जिस तरह से इधर उधर चलता है, वह नही चलते । ] मित्र शिकारी मया इस वने पैदा हुए बहुत से अस्सकण्ण तथा विभीटक खे। तानि वृक्ष यथा त्व सक्कसि, तू सक्रमण करता है, इधर उधर विचरता एव न सक्कन्ति, नही सक्रमण करते है, नही विचरते है।