जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४६ [ २.७.२१३ राजा ने वैसा ही किया। ऋषियो ने सोचा कि हम काम-भोगो को छोड प्रव्रजित हुए। फिर वृक्ष के नीचे की जगह के लिए झगडते हुए रिश्वत देने लगे। हमने यह अनुचित किया। इस प्रकार पश्चात्ताप कर वे जल्दी से भाग कर हिमालय ही चले गए। सकल भरु राष्ट्रवासी देवताओ ने एकत्र हो कर कहा—राजा ने शील- बानो में झगडा पैदा करके अच्छा नही किया। उन्होने क्रोधित हो तीन सौ योजन के भरु राष्ट्र को समुद्र मे तूफान लाकर नष्ट कर दिया। इस प्रकार एक भरु राजाओ के कारण सारा राष्ट्र विनाश को प्राप्त हुआ (यह) शास्ता ने यह पूर्व-जन्म की कथा ला अभिसम्बुद्ध होने पर यह गाथाएँ कही— इसीनमन्तर कत्वा भरूराजाति मे सुत, उच्छिन्नो सहराट्ठेन स राजा विभव गतो ॥ तस्मा हि छन्दागमन नप्पसंसन्ति पण्डिता, अदुट्ठचित्तो भासेय्य गिर सञ्चूपसंहित ॥ [ ऐसा मैने सुना कि ऋषियों में भेद करके भरु राजा अपने राष्ट्र सहित विनाश को प्राप्त हुआ। इसलिए पण्डित लोग पक्षपात की प्रशंसा नही करते। द्वेषरहित चित्त से सच्ची बात कह देनी चाहिए। ] अन्तर कत्वा, पक्षपात के कारण भेद करके। भरु राजा भरु राष्ट्र का राजा। इति मे सुत ऐसा मैने पहले सुना। तस्मा हि छन्दागमन, क्योकि पक्षपात करके भरु राजा राष्ट्र सहित नष्ट हुआ इसलिए पण्डित पक्षपात की प्रशंसा नही करते। अदुट्ठचित्तो, विकारो से मलिन चित्त न हो। भासेय्य गिरं सञ्चूपसहित यथार्थ, अर्थयुक्त, सकारण वाणी ही बोले। जिन्होने भरु राजा के रिश्वत लेते समय 'यह उचित नही हैं' कह निन्दा करते हुए सच्ची बात कही, वे जहाँ खडे थे वहाँ नारियल के द्वीप में आज भी हज़ारो दीपक (जलते) दिखाई देते हैं। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला 'महाराज, पक्षपात नहीं करना चाहिए, प्रव्रजितो में झगडा नही कराना चाहिए' कह जातक का मेल बैठाया।