भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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३४८ [ २.७.२१४ सत्य के गुणो की याद आई। उसने सोचा कि किसीको भेजकर मेरे लिए आचाय्यं को बुलाना ठीक नही। एक गाथा रच, पत्र लिख, कौवे का मास पकवा, सफेद वस्त्र से लपेट, राजकीय मोहर लगाकर भेजूंगा। यदि पण्डित होगा, पत्र पढ कर कौवे के मास का भाव समझ कर चला आएगा। नहीं, तो नही आएगा। उसने यह गाथा पत्र में लिखी— पुण्णं नदि येन च पेय्यमाहु, जातं यवं येन च गुह्यमाहु ॥ दूरं गतं येन च अब्भपन्ति, सो त्यागतो हन्द च भुञ्ज ब्राह्मण ॥ [ जिसके पीने योग्य होने से नदी पूर्ण समझी जाती है, जिसको छिपा रखने योग्य होने से जौ उत्पन्न हुए समझे जाते हैं; जिसके बोलने से दूर गए आने वाले समझे जाते हैं; वह तेरे लिए आया है। ब्राह्मण ! इसे खा।] पुण्ण नदि येन च पेय्यामाहु, 'काकपेय्य नदी' कहते हुए पूर्ण नदी को ही पेय्य कहते है। अपूर्ण नदी काकपेय्य नदी नही कहलाती; जब नदी किनारे खड़े हो गरदन पसार कर कौआ पी सकता है, तभी उसे काकपेय्य कहते हैं। जातं यवं येन च गुह्यमाहु, जो शीर्षक मात्र है। यहाँ सभी पैदा हुई, उत्पन्न हुई, तरुण खेती से मतलब है। वह जब अन्दर दाखिल हुए कौवे को छिपा सकती है तभी गोपन करने वाली होने से गुह्य कहलाती है। किसे छिपाती है ? कौवे को। इस प्रकार कौवे को छिपाने से काकगुह्य। काक-गुह्य कहने वाले (लोग) गुह्य-वचन का कारण कौवा होता है इसलिए काक-गुह्य कहते हैं। इसीलिए कहा है—येन च गुह्यमाहु । दूरं गतं येन च अब्भहन्ति दूर गया हुआ प्रवासी प्रिय जन होने पर; जिसके आकर बैठने पर (लोग) कहते हैं कि यदि अमुक नाम का व्यक्ति आने वाला है तो कौवे बोल अथवा जिसके बोलने पर लोग समझते हे क्योकि कौवा बोलता है, इसलिए अमुक नाम का व्यक्ति आएगा; इस तरह कहने वाले जिसके कारण कहते हैं, विचार करते हैं, व्यक्त करते हैं। सो त्यागतो वह तेरे लिए लाया गया है। हन्द च भुञ्ज ब्राह्मण, ब्राह्मण ग्रहण कर, खा ! मतलब इस कौवे के मास को खा।

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