जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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एतम्पि दिस्वा यह बात भी देखकर मरुविरिय रोद्ध नरो में श्रेष्ठ-वीर्य्यं । उत्तसवीर्य्यं राजवर ! वाचं पमुञ्चे कुसलं नातियेतं सत्यादि से युक्त कुशल वाणी ही पण्डित आदमी बोले; वह भी हियाकर समयानुकूल । समय (की सीमा) लांघ कर असीम वाणी न बोले। पस्ससि प्रत्यक्ष देखना है बहुभानेन अधिक बोलने से कच्छपं व्यसनं गतं, यह कछुआ मर गया ।
'राजा ने 'मेरे लिए यह कहा है' सोच पूछा—पण्डित ! मेरे बारे में कह रहा है ? बोधिसत्त्व—महाराज ! चाहे आप हो, चाहे कोई और हो, जो कोई सीमा लांघ कर बोलता है वह इसी प्रकार दु ख भोगता है। यह स्पष्ट करके कहा । उस समय से राजा संयम कर मितभाषी हो गया । शास्ता ने यह धर्म- देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय कछुवा कोकालिक था। दो हंस-बच्चे दो महास्थविर । राजा आनन्द । अमात्य पण्डित तो मैं ही था।
२१६. मच्छ जातक¹ "न मायमग्गि तपित " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय पूर्व-भार्या के आकर्षण के बारे में कही।
¹देखो मच्छ जातक (१. ४. ३४)