जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगरहित ] ३६३ बातचीत करते रहते हैं। ये पञ्च स्कन्ध अनित्य हैं, उत्पन्न होकर विनष्ट हो जाते हैं आदि नहीं जानते हैं। इस प्रकार राने हुए भटकते हैं। दुम्मेधानं अज्ञानियों की अरियधम्म अपस्सतं, बुद्धादि आर्य्यों के धर्म को न देखते हुए लोगो की अथवा नौ प्रकार के निर्दोष लोकोत्तर आर्य धर्म¹ को न देखते हुए लोगों की यही बातचीत होती है, अन्य अनित्यता या दुख की बातचीत उनकी नहीं होती। गहपतयो घर के मालिक। एको तत्थ उन दो घर के मालिकों में से एक अर्थात् स्त्री। वेणिकतो कृतवेणि, नाना प्रकार से जिसने अपने बालों को क्रम से गठिया रक्खा है। अथो भञ्जितकण्णको, वह ही बिंधे हुए कानो वाला, या छिदे हुए कानो वाला। लम्बे कानो के बारे में कहा। कीतो धनेन बहुना, यह मूछ विरहित, लम्बे स्तन वाला, वेणियारी, छिदे कान वाला माना पिता को बहुत धन देकर खरीदा गया, सजा कर, गहने पहना कर, गाडी में बिठा बडी शान-शौकत से घर में लाया गया। सो तं वितुदते जन, यह गृहस्वामी (स्वामिनी) जिस समय रो आता है उस समय से दासो, मजदूरा आदि को 'अरे दुष्ट दास यह नहीं करता है, अरी दुष्ट दासी यह नहीं करती हैं' आदि वचन-रूपी मुखशक्ति से बीधता है। स्वामी की तरह से व्यवहार करता है। इस प्रकार मनुष्यलोक में बहुत अनुचित है—मनुष्यलोक की निन्दा की। यह सुन सभी बन्दरो ने दोनो हाथो से अपने कान जोर से बन्द कर लिए— मत कहें। मत कहे। न सुनने योग्य बात हमने सुनी। इस स्थान पर हमने अनुचित बात सुनी। इसलिए उस स्थान की भी निन्दा कर अन्यत्र चले गए। उस पाषाण-शिला का नाम निन्दित-पाषाण शिला हो गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों के प्रकाशन के अन्त में वह भिक्षु सोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय के बानर-गण बुद्ध परिषद थी। बानरेन्द्र तो मैं ही था। ¹ चार लोकोत्तर मार्ग + चार लोकोत्तर फल + निर्वाण ।