भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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३७४ [ २.७.२२० उतना पानी भी सब समाप्त हो गया। सारी घाटियाँ सूख गईं। वहीं उसका प्राणान्त होकर वह अवीची नरक में पैदा हुआ। राजा ने वह समाचार सुन पुत्रशोक से अभिभूत हो सोचा—मेरा यह शोक प्रिय वस्तु से उत्पन्न हुआ। यदि मैं स्नेह न करता, तो शोक न होता। उसने निश्चय किया कि अब से किसी भी चीज में—चाहे वह जानदार हो चाहे बेजान हो—स्नेह पैदा न हो। उस समय से लेकर उसे स्नेह नहीं है। उसी सम्बन्ध से कित्तवासो नामह गाथा कही। पुत्तो पच्चेकबोधिमे पत्त भिन्दित्वा चवितो का अर्थ है कि मेरा पुत्र पच्चेकबुद्ध का पात्र तोडकर मर गया। निस्नेहो तस्स कारणा, उस समय उत्पन्न स्नेह के कारण स्नेह-रहित हो गया। तब राजा ने उसे पूछा—'मित्र ! किस बात को देखकर तू क्रोध-रहित हो गया ?' उसने वह बात बताते हुए यह गाथा कही— अरको हुत्वा मेत्तचित्तं सत्त वस्सानि भावयिं, सत्त कप्पे ब्रह्मलोके तस्मा अवकोधनो अह ॥ महाराज ! मैने अरक नामक तपस्वी हो, सात वर्ष तक मैत्री चित्त की भावना कर सात सवर्त्त विवर्त्त कल्पों तक ब्रह्मलोक में रहा। इसलिए मे दीर्घ काल तक मैत्रीभावना का अभ्यास करने से क्रोधि-रहित हो गया। इस प्रकार छत्तपाणि के अपने चारो अङ्ग कहने पर राजा ने परिषद को इशारा किया। उसी क्षण अमात्यो तथा ब्राह्मण गृहपति आदि ने उठकर 'अरे ! रिश्वतखोर ! दुष्ट चोर ! तू रिश्वत न पाकर पण्डित की निन्दा कर उसे मारना चाहता था' कह काळक के हाथ पाँव पकड, राजमहल से उतार जो जो हाथ मे आया पत्थर, मुद्गर आदि से सिर फोड मार डाला। फिर पाँव से घसीट कर कूडे की जगह पर फेक दिया। उसके बाद से राजा धर्मपूर्वक राज्य करता हुआ कर्मानुसार (परलोक) गया। शास्ता न यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय काळक सेनापति देवदत्त था। छत्तपाणि नाई सारिपुत्र। धर्मध्वज तो में ही था।