भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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३८२ [ २.८.२२३ क. वर्तमान कथा श्रावस्ती नगर निवासी एक गृहस्थ जनपदनिवासी एक गृहस्थ के साथ लेन-देन करता था। वह अपनी भार्या को लेकर अपने करजदार के पास गया। उसने 'दे नहीं सकता हूँ' कह, कुछ न दिया। वह क्रुद्ध हो बिना कुछ खाए ही चल दिया। रास्ते में उसे भूख से पीड़ित देख, रास्ता चलने वाले आदमियो ने भात की पोटली दी—भार्या को भी देकर खाओ। उसने वह ले उसे न देने की इच्छा से कहा—भद्रे, यह चोरो के ठहरने का स्थान है। तू आगे आगे जा। फिर सब भात खा चुकने पर उसे खाली पोटली दिखा कहा—भद्रे, उन्होने भात-रहित खाली पोटली ही दी। यह जान कि यह अकेला ही खा गया, उसे दुःख हुआ। वे दोनो जेतवन विहार की पिछली तरफ से जाते हुए पानी पीने के लिए जेतवन मे प्रविष्ट हुए। शास्ता भी उनके आने की प्रतीक्षा करते हुए गन्धकुटी की छाया मे वैसे ही बैठे जैसे रास्ता घेर कर कोई शिकारी बैठा हो। वे दोनो शास्ता को देख, पास जा, प्रणाम कर बैठे। शास्ता ने उनका कुशल समाचार पूछ स्त्री से प्रश्न किया—भद्रे ! क्या यह तेरा स्वामी तेरा हितैषी है, क्या तेरे प्रति स्नेह रखता है ? “भन्ते, मेरा तो इसके प्रति स्नेह है, किन्तु यह मेरे प्रति स्नेह-रहित है। और दिनो की बात रहने दे आज ही इसे रास्ते म भात की पोटली मिली। यह बिना मुझे दिए ही स्वयं खा गया।” “उपासिका, तू नित्य इसकी हितैषिणी तथा इसके प्रति स्नेह रखती रही है। यह स्नेह रहित ही रहा है। लेकिन जब इसे पण्डितों की जबानी तेरे गुण मालूम होते हैं, तो यह तुझे सारा ऐश्वर्य दे देता है।” उसके प्रार्थना करने पर (भगवान् ने) पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल म वाराणसी म ब्रह्मदत्त के राज्य करन के समय बोधिसत्त्व आमात्य कुल में पैदा हो बड़े होने पर उसके अर्थधर्मानुशासक हुए।