भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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कुम्भील ] ३८५ नमे नमन्तस्स भजे भजन्त जो अपने सामने झुके उसी के सामने झुके। जो संगति करता है उसी से संगति करे। किच्चानुकुब्बस्स करेय्य किच्चं, काम पड़ने पर जो अपने काम आये, काम पड़ने पर उसका भी काम करे। चजे चजन्तं वणयं न कयिरा अपने को छोड़ने वाले को छोड़ ही दे। उससे तृष्णा नामक स्नेह न करे। अपेतचित्तेन विगन चित्त से वा बदलं हुए चित्त (वाले) के साथ। न सम्भजेय्य वैसे के साथ न मिले जुले। द्विजो दुमं जैसे पक्षी पहले फले होने पर भी जब वृक्ष के फल नहीं रहते तो क्षीणफल हुआ जान उसे छोड़ दूसरे को देखता है, खोजता है उसी तरह अञ्ञं समवेक्खेय्य महा हि यहु लोको। तुम्हें स्नेह करने वाला एक न एक आदमी मिल जायगा। यह सुन बाराणसी राजा ने देवी को सब ऐश्वर्य दिये। तब से लगाकर मिल जुलकर प्रसन्नता पूर्वक रहने लगे। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर दोनो पति पत्नी स्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुए। उस समय पति पत्नी यह दोनो पति पत्नी थे। पण्डित ग्रामात्य तो मैं ही था। २२४. कुम्भार जातक¹ “यस्सेते चतुरो धम्मा...” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही। ¹देखें वानरिंद जातक (५७)। कथा समान है। केवल एक गाथा अधिक है। २५