भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 408

३६० [ २.८.२२६ वे शत्रु इसे अकेला निकला वा जाता देख मारकर महाविनाश को पहुँचा देंगे। यह उपमा है—यङ्ककसेनाय कोसियं जिस प्रकार यह कौओं की सेना इस असमय पर निकले, जाने उल्लू को चोंच से ठोंगे मारती है, महाविनाश को प्राप्त करती है वैसे ही। इसलिए पशु-पक्षियों तक को भी—किसीको भी असमय पर अपने निवासस्थान से नहीं निकलना चाहिए, नहीं चल पड़ना चाहिए। दूसरी गाथा में धीर का मतलब है पण्डित। विधि पुराने बुद्धिमान लोगों द्वारा स्थापित परम्परा। विधानं हिस्सा या क्रम। विवरन्तगू भेद को जानते हुए। सब्बामित्ते सभी शत्रु। वसी कत्वा अपने वश में करके। कोसियोव इस मूर्ख उल्लू से भिन्न किसी दूसरे बुद्धिमान उल्लू की तरह। मतलब यह है कि जो बुद्धिमान 'इस समय निकलना चाहिए, पराक्रम करना चाहिए; इस समय नहीं निकलना चाहिए, नहीं पराक्रम करना चाहिए' यह पुराने पण्डितों द्वारा स्थापित परम्परा नामक जो विधि है उसके विभाग नामक विधान को, अथवा विधि के विधान, क्रम वा अनुष्ठान को जानता है; वह विधिविधान को जानने वाला पराए और अपने भेद को जानकर जैसे बुद्धिमान उल्लू रात्रि को अपने समय पर निकल पराक्रम कर जहां तहां सोए हुए कौओ के सिरों को छेदता हुआ उन सभी शत्रुओं को वश में कर सुखी होता है, इस प्रकार बुद्धिमान आदमी समय पर निकल पराक्रम कर अपने शत्रुओं को वश में कर सुखी होवे, दुःखरहित होवे। राजा बोधिसत्व का कहना सुन रुका। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा आनन्द था। पण्डित आमात्य तो मैं ही था।