भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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कामनीत ] ३६७ कुरयो का मतलब है कुरु राष्ट्र, उसमें इन्दपत्त नाम का नगर है। केकये प्रथमा विभक्ति के अर्थ में द्वितीया है। इससे केकय राष्ट्र का मतलब है। वहाँ केक्य राजधानी ही नगर है। ततुत्तरिं मैने यहाँ वाराणसी राज्य तो प्राप्त किया है और तीन राज्य कामयामि। तिकिच्छ मं ब्राह्मण काम- नीत, इन वस्तु-कामनाओं तथा भोग-कामनाओं से ले जाए गए, मारे गए मुझको, हे ब्राह्मण ! यदि सामर्थ्य है तो अच्छा कर। शक्र ने 'महाराज ! जड़फूल की ओषधियों से तेरी चिकित्सा नही हो सकती, ज्ञानौषध से ही तेरी चिकित्सा हो सकती है' कह दूसरी गाथा कही— कण्हाहिदिट्ठस्स करोन्ति हेके अमनुस्सावद्वस्स¹ करोन्ति पण्डिता; न कामनीतस्स करोति कोचि ओक्कन्तसुक्कस्स ही का तिकिच्छा ॥ [ कोई कोई काले साँप से डसे की चिकित्सा करते हैं, कोई कोई पण्डित भूत प्रेतादि अमनुष्यों से अभिभूतो की चिकित्सा करते हैं, लेकिन कामनाओं के जो वशीभूत हुआ है उसकी कोई चिकित्सा नही करता। जो शुक्लधर्म की मर्यादा को लाँघ गया, उसकी क्या चिकित्सा ? ] कण्हाहिदिट्ठस्स करोन्ति हेके कुछ चिकित्सक घोर विषैले सर्प, काले सर्प से डसे हुए की मन्त्रो से तथा औषधिया से चिकित्सा करते हैं। अमनुस्सवद्वस्स करोन्ति पण्डिता, दूसरे पण्डित भूतवैद्य, भूतयक्षादि अमनुष्यों द्वारा मारे गए, अभिभूत, ग्रहण किए गए, लोगो की बलिकर्म, परित्तकर्म, औषध तथा भावना आदि से चिकित्सा करते है। न कामनीतस्स करोति कोचि कामनाओ के वशीभूत आदमी की पण्डितों को छोड़ दूसरा कोई चिकित्सा नही करता। यदि करे भी, तो कर नही सकता। किस कारण से ? ओक्कन्तसुक्कस्स ही का तिकिच्छा, जिन्होने कुशल धर्म को पार कर लिया, जिन्होने कुशलधर्म की ¹'अमनुस्सयिद्वस्स' पाठ अच्छा है।