जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदुतियपलासी ] ४०३ के सामने उसी तरह स्थिर रहती है जैसे हवा के सामने पर्वत। दुप्पसहो अह्ममज्ज तादिसेन इस सेना के साथ में आज वैसे (शत्रु) से दुर्जेय हूँ। महल पर खडे योधिसत्त्व के बारे मे कहता है। उसने उसे अपना पूर्ण चन्द्र की सी शोभा वाला मुख दिखला कर धम- काया—मूर्ख, बकवास मत कर, जिस प्रकार मस्त हाथी सरकण्डे के वन को नष्ट कर देता है उसी प्रकार अभी तेरी सेना को विध्वंस करूँगा। और दूसरी गाथा कही— मा बालियं विप्पल्लपि न हिस्स तादिसं विळम्हसे नहि लभसे निसेधकं; आसज्जसि गजमिव एकचारिनं यो तं पदा नळमिव पोथयिस्सति ॥ [ मूर्खता की बात मत बक । ऐसा नही हो सकता; 'मुझे रोकने वाला नही मिलेगा' सोच उछलता है। तू एकचारी हाथी के सामने आया है जो तुझे वैसे ही पांव से कुचल देगा जैसे सरकण्डे को ।] मा बालियं विप्पलपि अपनी मूर्खता मत बक। न हिस्स तादिसं अथवा न हिस्स तादिसो पाठ है। मेरी सेना अनन्त है, इस प्रकार विचार कर राज्य जीत सकने वाला तेरे जैसा न होवे या नही होता है। विळम्हसे तू केवल राग, द्वेष, मोह तथा मान से जलकर उबल रहा है। नहिलभसे निसेधक मेरे जैसे को जीत कर फिर और रुकावट डालने वाला तुझे न मिलेगा। जिस रास्ते से तू आया है उसीसे भगाऊँगा। आसज्जसि प्राप्त हुआ है। गजमिव एकचारिनं एकचारी मस्त हाथी की तरह। यो तं पदा नळमिव पोथयिस्सति जो तुझे उसी तरह कुचल देगा जिस तरह मस्त हाथी पाँवो से सरकण्डे को कुचलता है, अच्छी तरह पीस डालता है। तू उसे प्राप्त हुआ, यह अपने बारे मे कहा।