भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 426

थीणपूण ] ४०६ क. वर्तमान कथा वह श्रावस्ती के एक सेठ की लड़की थी। उसने अपने घर में वृषभराज का सत्कार होते देख दाई से पूछा- माँ, यह कौन है जिसका इस प्रकार सत्कार होता है ? "बेटी, यह वृषभराज है।" एक दिन उस लड़की ने प्रासाद पर खड़े होकर गली में एक कुबड़े को देखा। उसने सोचा-बैलों में जो ज्येष्ठ होता है उसकी पीठ पर एक ककुध होता है, मनुष्यों में जो बड़ा हो उसकी पीठ पर भी होना चाहिए। यह मनुष्यों में वृषभ-राज होगा। मुझे इसकी चरणसेविका बनना चाहिए। उसने दासी को भेजकर उसे कहलवाया कि सेठ की लड़की तेरे साथ जाना चाहती है। तू अमुक स्थान पर जाकर ठहर। वह कीमती चीजें ले, भेष बदल, महल से उतर उसके साथ भाग गई। आगे चलकर यह बात नगर में और भिक्षुसङ्घ में प्रकट हो गई। धर्मसभा में भिक्षुओं ने बात चलाई-आयुष्मानो ! अमुक सेठ-लड़की कुबड़े के साथ भाग गई। शास्ता ने आकर पूछा- भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा- भिक्षुओ, न केवल अभी यह कुबड़े को चाहती है, इसने पहले भी कुबड़े की ही इच्छा की है। इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व ने एक निगम-ग्राम में सेठ के कुल में पैदा हो, गृहस्थी बसाते हुए, पुत्र-पुत्री के साथ बढ़ते हुए अपने पुत्र के लिए वाराणसी-सेठ की लड़की पक्की कर दिन का निश्चय किया। सेठ की लड़की ने अपने घर पर वृषभ का सत्कार-सम्मान होते देख दाई से पूछा- यह कौन है ? उसने कहा- यह वृषभ है। तब सेठ की लड़की ने गली में जाते हुए एक कुबड़े को देखकर समझा कि यह पुरुषों में वृषभ होगा। उसने कीमती सामान लिया और उसके साथ भाग गई।