जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२ [ १.१२.११३ क. वर्तमान कथा उस समय धर्म-सभा में बैठे हुए भिक्षु बातचीत कर रहे थे—'आयुष्मानो ! देवदत्त पाँच सौ भिक्षुओं को लेकर गयाशीर्ष चला गया। वहाँ जाकर उसने उन भिक्षुओं को कहा कि श्रमण गौतम जो करता है वह धर्म नहीं है बल्कि जो मैं करता हूँ वह धर्म है। इस प्रकार उन्हें अपने मत का बना, यथास्थान झूठा आचरण कर संघ में फूट डाल एवं सीमा¹ में दो उपोसथ² (-गृह) बना दिए।" यूँ वे देवदत्त के दोष कह रहे थे। भगवान् ने आकर पूछा— "यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "यह बातचीत ।" "भिक्षुओ ! देवदत्त केवल अभी झूठ बोलनेवाला नहीं। यह पूर्व- जन्म में भी झूठ बोलनेवाला ही रहा है" वह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि- सत्त्व श्मशान-वन में एक वृक्ष-देवता होकर उत्पन्न हुए। उस समय वारा- णसी में नक्षत्र की घोषणा हुई। मनुष्यों ने यक्षों को बलि देने की इच्छा से चौराहों और दूसरे रास्तों पर मत्स्य-मांस आदि बखेर कर खप्परों में शराब रक्खी। एक गीदड़ आधी रात के समय चुपके से नगर में दाखिल हुआ। मत्स्य- मांस और शराब पीकर व पुन्नाग-वृक्ष के बीच जाकर सो रहा। सोते सोते सूर्य निकल आया। आँख खोलने पर प्रकाश हुआ देख उसने सोचा— "अब मैं नगर से निकल नहीं सकता।" इसलिए वह रास्ते के पास जाकर छिपकर लेट रहा। दूसरे मनुष्यों को आते-जाते देख वह कुछ नहीं बोला, लेकिन एक ब्राह्मण को मुँह धोने के लिये जाते देख उसने सोचा—"ब्राह्मण ¹ सीमित-प्रदेश। ² जहाँ भिक्षु एकत्र हो सांघिक-कृत्य करते हैं।