जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगुगल ] ४३७ [ यह कुत्ता मूर्ख है जो चमड़े की डोरी को नहीं खाता है । (यदि खा डाले) तो बन्धन से छूट जाए और भरे पेट ही घर चला जाए । ] पमुञ्चेय्य मुखं घरं; अथवा पमोच्चेय्य ही पाठ है । असितो च घरं वने भरे पेट ही अपने निवास-स्थान पर चला जाए । उसे सुन कुत्ते ने दूसरी गाथा कही— अट्ठितं मे मनस्मिं मे अथो मे हृदये कतं, कालञ्च पतिकङ्खामि याव पस्सुपतु जनो ॥ [ यह मेरा अधिष्ठान था, यह मेरे मन में था; और यह (तुम्हारा) कहना भी हृदय में रख लिया। मैं समय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जबकि लोग सो जाएँ । ] अट्ठितं मे मनस्मिं मे जो तुम कहते हो वह पहले से मेरा सङ्कल्प है, वह मेरे मन ही में है । अथो मे हृदये कतं तुम्हारा वचन भी मैने हृदय में कर लिया है । कालञ्च पतिकङ्खामि समय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ । याव पस्सुपतु जनो जब तक यह लोग सो जाते हैं, इन्हें नींद आ जाती है, तब तक मैं समय की प्रतीक्षा करता हूँ । नही तो हल्ला हो जाएगा कि यह कुत्ता भाग रहा है। इसलिए रात को जब सब सो जाएँगे चमड़े की डोरी खाकर भाग जाऊँगा । यह कहकर वह लोगो के सो जाने पर चमडे की डोरी खा, पेट भर कर, भागा और अपने स्वामी के ही घर गया । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय का कुत्ता इस समय का कुत्ता है । पण्डित पुरुष तो मैं ही था ।