भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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४४२ [ २.१०.२४३ ] "आचार्य्य ! जगल में क्यो दाखिल हुए हो ?" "तू कौन है ?" "मै शक्र हूँ।" बोधिसत्त्व ने उसे 'देवराज ! मैं शिष्य के भय से जगल में दाखिल हुआ हूँ' यह पहली गाथा कही— सत्ततन्ति सुमधुर रामणेय्य अवाचायि, सो म रङ्गमन्हि अव्हेति सरणम्मे होहि कोसिय ॥ अर्थ—हे देवराज ! मैने मूसिल नाम के शिष्य को सात तारो वाली सुमधुर रमणीक वीणा जितनी मै जानता था उतनी सिखाई । अब वह मुझे रङ्गमंच पर ललवारता है। हे कोसिय गोत्र (इन्द्र) ! तू मुझे शरण में ले। शक्र उसकी बात सुन बोला—डरे मत । मै तुम्हारा त्राण करूँगा । मैं तुम्हें शरण दूंगा। यह कह उसने दूसरी गाथा कही— अह त सरण सम्म अहमाचरियपूजको, न त जयिस्सति सिस्सो सिस्समाचरिय जेस्सति ॥ [ सौम्य ! मै तेरा शरणदाता हूँ। मै आचार्य्य की पूजा करने वाला हूँ। शिष्य तुझे नही जीतेगा। आचार्य्य ही शिष्य को जीतेगा।] अह त सरण मै शरण (-दाता हूँ), सहायक होकर, प्रतिष्ठा देकर त्राण करूंगा। सम्म प्रिय वचन है। सिस्समाचरिय जेस्सति आचार्य्य ! तू वीणा बजाता हुआ शिष्य को जीतेगा। शक्र ने और भी कहा—"तुम वीणा बजाते हुए एक तार तोडकर छ , बजाना। वीणा से स्वाभाविक स्वर निकलेगा। मूसिल भी तार तोड देगा। उसकी वीणा से स्वर न निकलेगा। उसी क्षण पराजित हो जाएगा। उसका पराजित होना जान दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी, छटी और सातवी तार भी तोड कर केवल वीणा-दण्ड ही बजाना। तार रहित खूंटियो से स्वर निकल कर सारी बारह योजन की वाराणसी नगरी को ढक लेगा।" इतना कहकर