भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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गुत्तित ] ४४५ "अभिक्कन्तेन वण्णेन या त्वं तिट्ठसि देवते, ओभासेन्ती दिसा सब्बा ओसधी विय तारका ॥ केन ते तादिसो वण्णो केन ते इध मिज्झति, उप्पज्जन्ति च ते भोगा ये केचि मनसो पिया ॥ पुच्छामि तं देवि महानुभावे मनुस्सभूता किमकासि पुञ्ञं, येनासि एवं जलितानुभावा वण्णो च ते सब्बदिसा पभासति ॥" [ हे देवते ! यह जो तेरा कान्तिपूर्ण वर्ण है, यह जो सारी दिशाएँ इस प्रकार प्रकाशित है जैसे ओषधी तारा हो, सो यह तेरा ऐसा वर्ण किस कारण से है ? तू किस कारण से यहाँ ऋद्धिमान् है ? जो भोग तुझे प्यारे लगते हों, वह किस कारण से प्राप्त होते हैं ? हे महानुभाव देवि ! मैं तुझसे पूछता हूँ कि मनुष्य योनि में तूने क्या पुण्य कर्म किया ? जिस कर्म के प्रभाव से तू प्रज्वलित अनुभाव की है ? और तेरा वर्ण सब दिशाओं को प्रकाशित करता है । ] "वत्थुत्तमदायिका नारी पवरा होति नरेसु नारिसु, एवं पियरूपदायिका मनापं दिब्बं सा लभते उपेच्च ठानं ॥ पस्स मे पस्स विमानं अच्छरा कामवण्णिनीहमस्मि, अच्छरासहस्सानं पवरा पस्स पुञ्ञानं विपाकं ॥ तेन मेतादिसो वण्णो तेन मे इध मिज्झति, उप्पज्जन्ति च मे भोगा ये केचि मनसो पिया, तेनम्हि एवं जलितानुभावा वण्णो च मे सब्बदिसा पभासति ॥ [ उत्तम वस्त्र देने वाली नारी नरों में और नारियों में श्रेष्ठ होती है। इस प्रकार प्रिय रूप देने वाली वह (नारी) मरकर सुन्दर दिव्य स्थान को प्राप्त करती है। मेरे विमान को देखो। मैं इच्छित रूप धारण करने वाली अप्सरा हूँ। मैं हजार अप्सराओं में श्रेष्ठ हूँ। यह पुण्य का फल है, देखो। इसीसे मेरा ऐसा वर्ण है। इसीसे मैं ऋद्धिमान् हूँ। इसीसे मन को जो प्यारे लगते हैं ऐसे भोग मुझे प्राप्त होते हैं। उसीसे मैं प्रज्वलित अनुभाव वाली हूँ। उसीसे मेरा वर्ण सब दिशाओं को प्रकाशित करता है।]