जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८ ४५२ [ २.१० २४६ प्रश्न समझ में आया ? वे बोले—नही जानते । बोधिसत्त्व ने फिर उनकी निन्दा करते हुए दूसरी गाथा कही— बहूनि नरसीसानि लोमसानि बृहन्ति च, गीवासु पटिमुक्कानि कोचिदेवेत्थ कण्णवा ॥ अर्थ—बहुत आदमियों के सिर दिखाई देते हैं। वे बालो वाले हैं। सभी बड़े बड़े हैं। गर्दनों पर रखे हैं। ताड के फल की तरह हाथ में पकड़े हुए नहीं हैं। इन बातो में किन्ही में आपस में भेद नहीं है। लेकिन यहाँ कोई ही कानवाला है। (यह अपने बारे में कहा) कण्णवा प्रज्ञावान् । कान का छेद तो किसको नहीं है ? इस प्रकार उन माणवकों की निन्दा कर कि तुम लोगो को कानो का छेद मात्र ही हैं, प्रज्ञा नहीं है प्रश्न समझाया। उन्होने सुनकर 'ओह ! आचार्य्य महान् होते हैं' क्षमा मांग नम्र हो बोधिसत्त्व की सेवा की। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पांच सौ माणवक यह भिक्षु थे। आचार्य्य मैं ही था । २४६. तेलोवाद जातक “हन्त्वा भत्वा वधित्वा च ” यह शास्ता ने वैशाली के आश्रय कूटा- गार शाला में विहार करते समय सिंह सेनापति के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उसने भगवान् (बुद्ध) की शरण जा, निमन्त्रण दे, अगले दिन मास सहित भोजन कराया। निगण्ठों ने उसे सुन कुपित हो असन्तुष्ट हो तथागत को १ निगण्ठ=निर्ग्रन्थ=जैन सम्प्रदाय वाले साधु ।