भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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अकालरावी ] ३७ ११९. अकालरावी जातक “अमातापितरि संवड्ढो” . यह धर्मदेशना शास्ता ने जेतवन मे रहते समय एक असमय शोर करनेवाले भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस श्रावस्ती-निवासी तरुण ने (बुद्ध-) शासन में प्रव्रजित हो न कर्तव्य सीखे न शिक्षा ग्रहण की। वह नहीं जानता था कि इस समय मुझे (झाडू लगाना आदि) काम करने चाहिए, इस समय मुझे सेवा के काम करने चाहिएः इस समय पाठ करना चाहिए। पहले याम में भी, बीच के याम, मे भी और पिछले याम में भी जब जब आंख खुलती, यह शोर करता था। भिक्षुओं को नींद न आती। धर्मसभा मे एकत्र हुए भिक्षु उसकी निन्दा करते— “आयुष्मानो ! यह भिक्षु इस प्रकार के रतन¹ शासन मे प्रव्रजित हो कर भी, न कर्तव्य जानता है, न शिक्षा जानता है, न समय जानता है और न असमय जानता है।” शास्ता ने आकर पूछा “भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?” “अमुक बातचीत” कहने पर कहा— “भिक्षुओ ! यह केवल अभी असमय शोर मचाने वाला नहीं है, पहले भी असमय हल्ला करनेवाला ही रहा है। समय असमय न जानने के कारण ही इसकी गर्दन मरोडी जाकर यह मृत्यु को प्राप्त हुआ।” इतना कह पूर्व जन्म की बात कही— ¹ बुद्ध, धर्म तथा संघ तीन रतन हैं।