जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ १० ] विषय पृष्ठ १३५. चन्दाभ जातक .. .. .. .. ८७ [ मरते हुए आचार्य्य ने 'चन्दाभ सुरियाभं' कहा। ज्येष्ठ शिष्य ही समझ सका।] १३६. सुवण्णहंस जातक .. .. .. .. ८८ [ लोभवश ब्राह्मणी ने सुवर्ण-हंस के सभी पर एक साथ उखाड़ लिए। वह सोने के न होकर साधारण पंख रह गए।] १३७. बब्बु जातक . .. .. .. ९१ [ चुहिया बिल्लो को मांस दे देकर अपनी जान बचाती थी। बोधिसत्व के उपदेश से वह सब को मारने में समर्थ हुई।] १३८. गोध जातक .. .. .. .. ९६ [ तपस्वी गोह का मांस खाना चाहता था। गोह ने ताड़ लिया—अन्दर से मैला है, बाहर ही साफ है।] १३९. उभतोभट्ठ जातक .. .. .. .. ९८ [ घर मे भार्य्या ने पडोसिन से झगड़ा कर लिया। बाहर मछली पकड़ने जाकर मछुवे की आँख फूट गई और कपड़े चोरी चले गए; इस प्रकार वह उभयभ्रष्ट हुआ।] १४०. काक जातक .. .. .. .. १०१ [ कौवे ने ब्राह्मण के सिर पर बीट कर दी। ब्राह्मण ने कौवों की जाति को ही नष्ट करने का संकल्प किया। बोधिसत्त्व ने अपनी जाति की रक्षा की।] १५. कक्कटक वर्ग १०५ १४१. गोध जातक (२) .. .. .. .. १०५ [ गोह की गिरगिट के साथ दोस्ती गोह-कुल नष्ट करने का कारण हुई।]