भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 67

४६ [ १.१३.१२१ वे 'अच्छा' कह 'बलि' ले उद्यान गए और वहाँ अगले दिन काटने के लिए 'बलि' चढ़ाई। वृक्ष-देवता को जब यह पता लगा कि कल मेरा निवास- स्थान¹ नष्ट कर देंगे, तो वह सोचने लगी कि बच्चों को लेकर कहाँ जाऊँगी ? जब कोई जाने की जगह न दिखाई दी, तो पुत्रों को गले से लगाकर रोने लगी। उसके देखे-सुने परिचित वृक्ष-देवता और वन-देवताओ ने आकर पूछा— “क्या हुआ ?” समाचार जान स्वयं भी कोई ऐसा उपाय न कर सकने के कारण जिससे बढ़ई वृक्ष को न काटे, उन्होंने गले मिलकर रोना प्रारम्भ किया। उसी समय बोधिसत्त्व वृक्ष-देवता से मिलने आए। वह समाचार सुन बोधिसत्त्व ने कहा— “होने दो। चिन्ता न करो। मैं बढ़इयों को वृक्ष काटने न दूंगा। कल बढ़इयों के आने के समय मेरा करतब देखना।” उस देवता को आश्वासन दे अगले दिन बोधिसत्त्व बढ़इयों के आने के समय गिरगिट का रूप बना बढ़इयों के आगे से गुजर मङ्गल-वृक्ष की जड़ में प्रवेश कर, उसमें खोखले वृक्ष की तरह ऊपर चढ़, स्कन्ध के बीच में से सिर निकाल उसे कँपाते हुए पड़ रहे। प्रधान बढ़ई ने उस गिरगिट को देख वृक्ष को हाथ से ठोक कर कहा— “यह खोखला है। निस्सार है। कल बिना विचार किए ही 'बलि' चढ़ाई।” इस प्रकार वे उस ठोस महावृक्ष की निन्दा करते हुए चले गए। बोधिसत्त्व की सहायता से वृक्ष-देवता विमान की स्वामिनी हुई। उसके देखे-सुने परिचित बहुत से देवता उसे मुबारकबाद देने के लिए इकट्ठे हुए। वृक्ष-देवता ने 'मुझे विमान मिल गया' सोच प्रसन्न हो उन देवताओ के सम्मुख बोधिसत्त्व की प्रशंसा करनी शुरू की—“हे देवताओ ! हम ऊँचे कुल वाले होकर भी बुद्धि की कमी के कारण इस उपाय को न जानते थे। कुशा घास के देवता ने अपने बुद्धिबल से हमें विमान का स्वामी बनाया। मित्रता अपने जैसे से भी, छोटे से भी, श्रेष्ठ से भी करनी ही चाहिए। सभी अपनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार मित्रो पर आई आपत्ति दूर कर उन्हें सुखी बनाते हैं।” इस प्रकार मित्र-धर्म की प्रशंसा करते हुए यह गाथा कही—


¹ विमान ।