भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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दुम्मेध ] ४६ एक दिन किसी उत्सव के अवसर पर राजा सारे नगर को देवनगर की तरह अलंकृत करा, सब अलंकारों से सजे हुए मंगल हाथी पर चढ़, बड़ी राजकीय शान के साथ नगर मे घूमने के लिए निकला । लोग जहाँ तहाँ खड़े होकर मंगल हाथी के अति सुन्दर शरीर को देख मंगल हाथी की ही प्रशंसा करने लगे—“ओह् ! क्या रूप है ! ओह ! क्या चाल है ! ओह ! कैसा ढंग है ! ओह ! कैसे लक्षण हैं ! इस प्रकार का सर्वश्रेष्ठ हाथी चक्रवर्ती राजा के योग्य है ।” राजा ने मंगल हाथी की प्रशंसा सुन उसे न सह सकने के कारण, ईर्ष्या के वशीभूत हो सोचा, “आज ही इसे पर्वत-प्रपात से गिरवा कर मरवा डालूँगा ।” फिर हथवान को बुलवाकर पूछा— “तूने इस हाथी को क्या (खाक) सिखाया है ?” ‘देव ! अच्छी तरह से सिखाया है ।” “नही, अच्छी तरह से नही सिखाया, खराब सिखाया है ।” ‘देव ! अच्छी तरह से सिखाया है ।” “यदि अच्छी तरह से सीखा, तो क्या तू इसे वेपुल्ल पर्वत के ऊपर चढ़ा ले जा सकता है ?” “देव ! हाँ ।” “अच्छा, तो आ” कह अपने उतर हथवान् को हाथी पर चढ़ा पर्वत के पास जा, हथवान् के हाथी की पीठ पर बैठे ही हाथी को पर्वत के ऊपर चढ़ा ले जाने पर, आमात्यो के साथ स्वयं भी पर्वत के शिखर पर चढ़, हाथी का मुंह प्रपात की ओर करवा कहा—“तू कहता है कि मैंने इसे अच्छी तरह सिखाया है । इसे तीन ही पैरों से खड़ा कर ।” हथवान् ने पीठ पर बैठे ही बैठे हाथी को अंकुश द्वारा इशारा किया, ‘भो ! तीन पैरो से खड़े हो जाओ ।” वह तीन पैरों से खड़ा हो गया । तब राजा बोला—“आगे के दो पैरों के भार खड़ा करा ।” बोधिसत्व पिछले दोनों पैर उठाकर अगले पैरों पर खड़े हुए । ‘पिछले ही पैरो पर’ कहने पर आगे के दोनों पैर उठाकर पिछले ही पैरों पर खड़े हो गए । ‘एक ही पैर से’ भी कहने पर तीनों पैर उठा एक ही पैर से खड़े हो गए । उसे न गिरता देख राजा ने कहा—‘यदि कर सको, तो इसे आकाश में खड़ा करो ।’ ४