भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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५४ [ १.१३ १२३ "आचार्य्य ! आज हमने ऊस खाया।" "ऊस कैसा होता है ?" "हल की फाल की तरह।" थोड़ी सीधी बात कहता है, सोच आचार्य्य चुप रहे। फिर एक दिन निमन्त्रण में कुछ विद्यार्थियो ने दही के साथ गुड़ खाया, कुछ ने दूध के साथ। उसने आकर कहा—'आज' हमने दही दूध के साथ खाया। "दूध दही कैसा होता है ?" "हल की फाल की तरह।" आचार्य्य ने सोचा—इस विद्यार्थी ने साँप की हल की फाल से उपमा दी, सो तो ठीक रहा। हाथी की हल की फाल से उपमा दी, वह भी सुण्ड का ख्याल करके कहा, इससे कुछ ठीक रहा। ऊस को हल की फाल के सदृश कहा, उसमे भी खैर कुछ ठीक है। लेकिन दूध दही तो सफेद होते हे, जैसा बरतन होता है वैसा ही उनका आकार हो जाता है। यहाँ तो उपमा सर्वथा गलत है। इस मूर्ख को न सिखा सकूँगा। यह कह, यह गाथा कही— असव्वत्थगामि वाच बालो सव्वत्थ भासति, नायं दधिं वेदि न नङ्गलीसं दधिम्पय मञ्जति नङ्गलीसं ॥ [ मूर्ख सब जगह ठीक न बैठनेवाली बात सब जगह कहता है। न यह दही को जानता है, न हल के फाल को। यह दही को भी हल की फाल समझता है।] ——— सक्षिप्तार्थ यूं है—जो वाणी उपमारूप स सर्वत्र लागू नहीं होती, वह असव्यत्थ गामिं वाच बालो जड आदमी सव्वत्थ भासति । दधि कैसा होता है पूछने पर कहता है जैसे हल की फाल। इस प्रकार कहता हुआ नायं दधिं वेदि न नङ्गलीसं । क्या ? क्योकि दधिम्पय मञ्जति नङ्गलीसं, यह दही को भी हल की फाल मानता है। अथवा दधि कहते हं दही को। पय कहते हैं दूध को। दधि ओर पय दधिप्पय, यह दही और दूध को भी हल की फाल मानता है,

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