जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकलण्डुक ] ६७ उस तोते के बच्चे ने भी नदी के किनारे एक गूलर की शाखा पर बैठ कलण्डुक को पहचान लिया और देखा कि वह सेठ-कन्या के सिर पर थूक रहा है। उसने कहा—"अरे ! कलण्डुक ! दास ! अपनी जाति और (पूर्व) निवास-स्थान को याद कर। दूध से मुँह भर, उसका कुल्ला कर ऊँची जाति- वाली सुख में पली हुई सेठ की कन्या के सिर पर मत थूक। तू अपनी हैसियत को नहीं देखता ?" फिर यह गाथा कही— ते देसा तानि यत्थूनि अहञ्च वनगोचरो, अनुविच्च खो त गण्हेय्यु पिव खीरं कलण्डुक ॥ [वह देश और वस्तुएँ (=कोख)। मैं वनचर पक्षी। तुझे पहचान कर पकड़ लगे। कलण्डुक दूध पी।] ते देसा तानि यत्थूनि, यह माता की कोख के बारे म कहा है। भावार्थ यह है—जहाँ तू रहा है वह क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है, अथवा जहाँ तू प्रतिष्ठित रहा है वह भी क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है। तू दासी की कोख मे रहा और प्रतिष्ठित हुआ। अहञ्च वन गोचरो—मै तिरश्चीन योनि में पैदा होकर भी यह सब जानता हूँ, यह प्रकट करता है। अनुविच्च खो त गण्हेय्यु, इस प्रकार अनाचार करते हुए को देख जब मैं जाकर कहूँगा तो पहचानकर वह तेरे स्वामी आकर तुझे ताड़कर और दाग देकर पकड कर ले जायेगें। इसलिए अपनी हैसियत देखकर सेठ की लडकी के सिर पर बिना थूके हुए पिव खीर कलण्डुक, नाम से सम्बोधन करता है कि (हे कलण्डुक दूध पी)। कलण्डुक ने भी तोते के बच्चे को पहचानकर 'यह मुझे प्रकट कर रहा है' सोच भयभीत हो कहा—आइए ! स्वामी ! कब आए ? तोते के बच्चे ने सोचा यह मेरा हित चिन्तक होकर नही बुला रहा है। यह मेरी गरदन मरोड़कर मार डालना चाहता है। यह समझकर कहा कि मुझे तुझसे काम नहीं है। तब वह उड़कर बाराणसी गया और जैसे जैसे देखा था सेठ को विस्तार- पूर्वक सब कहा।