जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७८ [ १.१४.१३१ बोधिसत्व ने सोचा—यह असत्पुरुष मेरे पास से चालीस करोड़ धन पाकर अब तूम्बा भर भूसा दे रहा है। इसे लूँ अथवा न लूँ ? उसे विचार हुआ— यह तो अकृतज्ञ है, मित्रद्रोही है, कृत उपकार को भूलकर इसने मेरे साथ मैत्री- सम्बन्ध तोड़ डाला है। यदि में इसका दिया तूम्बा भर भूसा बुरा होने के कारण नही ग्रहण करता हूँ, तो में भी मैत्री सम्बन्ध को तोडनेवाला होता हूँ । इसलिए मै इसके दिए तूम्बा भर भूसे को ग्रहण कर अपनी ओर से मैत्री-भाव की प्रतिष्ठा करूँगा । उसने तूम्बा भर भूसे को अपने पल्ले में बांध लिया और महल से उतर शाला को गया । स्त्री न पूछा—आर्य्य, तुम्हें क्या मिला ? "भद्रे ! हमारे मित्र पिल्लिय सेठ ने हमें तूम्बा भर भूसा दे आज ही विदा कर दिया ।” उसने रोना प्रारम्भ किया—आर्य्य ! इसे लिया ही क्यो ? क्या चालीस करोड़ धन का बदला यही है ? बोधिसत्त्व ने कहा—भद्रे, रो मत । मैने अपनी ओर से मैत्री-सम्बन्ध न टूटने देने के लिए, अपनी ओर से उसे बनाए रखने के लिए ग्रहण किया है । तू क्यों सोच करती हैं । —इतना कह यह गाथा कही— असम्पदानेनितरीतरस्स बालस्स मित्तानि कती भवन्ति, तस्मा हरामि भुसं अद्धमानं मा मे मित्ति ओपिय सस्सतायं ॥ [ऐसी वैसी वस्तु स्वीकार न करने से मूर्ख आदमी के मित्र मित्र नहीं रहते । इसीलिए में अर्धमान भूसा ले आया हूँ । मेरा मैत्री-सम्बन्ध न टूटे । यह शास्वत बना रहे ।] असम्पदानेन, परस्पर का लोप होकर सन्धि हुई है, अर्थ है ग्रहण न करने से । इतरीतरस्स, जिस किसी अच्छी बुरी चीज के । बालस्स मित्तानि कसी भवन्ति, मूढ, अप्रज्ञावान् के मित्र स्खलित हो जाते हैं, मनहूस से हो जाते हैं,