जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished588 पृष्ठ
पृष्ठ 112, कुल 588 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 112
- ८६ सटीकजातकपारिजाते- मेष, कर्क, तुला, वृश्चिक, और कुम्भ इन राशियों में से कोई राशि लग्नमें हो वा इनके अंशमें से किसीका अंश हों तो वास्तुके पूर्व भागमें जन्म कहे । धनु, मीन, मिथुन और कन्या, इन राशिमें या इनके अंशमें लग्न हो तो उत्तरमें, वृष राशि हो तो पश्चिममें, सिंह या मकर राशि लग्नमें हो तो दक्षिण दिशामें प्रसव कहे ॥ ७३ ॥ अथ सूतीगृहे जन्मस्थानम् । प्राच्यादिगृहे क्रियादयो द्वौ द्वौ कोणगता द्विमूर्त्तयः । शय्यास्वपि वास्तुवद्वदेत् पादैः षट्त्रिनवान्त्यसंस्थितैः ॥ ७४ ॥ सूतिकागृहे पूर्वाद्यासु चतसृषु दिक्षु मेषादिक्रमेण द्वौ द्वौ राशी, तथा आग्नेयादिकोण चतुष्टयेषु मिथुनाद्या द्वन्द्वाः स्थाप्याः । अर्थात्जन्मनि यो राशिर्लग्नं तस्य या दिक्तस्या- मेव दिशि सूतिकागृहे जन्म वाच्यम् । एवमेव शय्यायामपि वाच्यम् । स्पष्टार्थं चक्रद्वयं विलोक्यम् । शय्यायां यत्र द्वन्द्वस्तत्र विनतत्वं यत्र पापस्तत्रोपघातो वाच्यः इति ॥ ७४ ॥ अत्र अङ्का राशयो ज्ञेयाः । अत्र अङ्का भावाः । मेष, वृष राशिका लग्न हो तो प्रसूती घरमें पूर्व, मिथुनसे अग्निकोण, कर्क, सिंहसे दक्षिण, कन्यासे नैर्ऋत्यकोण, तुला, वृश्चिकसे पश्चिम, धनुसे वायव्य, मकर, कुम्भसे उत्तर और मीनसे ईशान भागमें जन्म कहना चाहिये । इसी तरह शय्या (चारपाई) में भी विचारना । यहां विशेषता यह है कि शय्यामें भावोंका न्यास करना, याने लग्न और २ रा भाव सिरकी ओर, ३ रा भाव शिरहानेकी दक्षिण पावा, ४ । ५ भाव दाहिनी पाशी, ६ ठा भाव पौथानेकी दाहिनी पावा, ७ । ८ भाव पैरकी ओर, ९ वां पौथानेकी बाँयीं पावा, १० । ११ भाव बाँयीं पाशी और १२ वां भाव शिरहानेकी बाँयीं पावापर न्यास करे । इसका प्रयोजन यह है कि जिस भागमें द्विसभाव राशि हो, उस अङ्गमें टेढ़ापन और जिस भागमें पापग्रह हों उस अङ्गमें आघात कहना चाहिये । ( बृ शा० कार ) ॥ ७४ ॥ अथ उपसूतिकाज्ञानम् । लग्नचन्द्रान्तरगतैर्ग्रहैः स्युरुपसूतिकाः । बहिरन्तश्च चक्रार्द्धे दृश्यादृश्येऽन्यथा परे ॥ ७५ ॥ लग्नाच्चन्द्रपर्यन्तं यावन्तो ग्रहा भवेयुस्तावन्मिता उपसूतिकाः = प्रसवदर्शिकाः स्त्रियो भवन्ति । तत्र दृश्ये चक्रार्द्धे = सप्तमादिद्वादशभावाभ्यन्तरे यावन्तो ग्रहास्तावत्यः स्त्रियो