भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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आयुर्दायाध्यायः ॥ ५ ॥ १५१ पापग्रहेण संदृष्टे क्षयरोगान्मृतिं वदेत् ॥ ८८ ॥ अष्टमस्थानगे शुक्रे पापग्रहेनरीक्षिते । वातरोगात्क्षयाद्वाऽपि प्रमेहाद्वा मृतिं वदेत् ॥ ८६ ॥ सूर्यस्थानगते सौम्ये पापग्रहेनरीक्षिते । त्रिदोषान्मरणं विन्द्याज् ज्वररोगेण वा वदेत् ॥ ६० ॥ मृत्युस्थानगते राहौ पापग्रहेनरीक्षिते । पिटकाद्युष्णरोगाद्वा सर्पदोषान्मृतिर्भवेत् ॥ ६१ ॥ पराभवगते राहौ पापग्रहेनरीक्षिते । मसूरिकादिरोगाद्वा पित्तभ्रंशान्मृतिं वदेत् ॥ ६२ ॥ सरलार्थः श्लोकाः ॥ ८७-६२ ॥ अष्टमस्थानमें निर्बल सूर्य हो वा निर्बल मंगल हो, धनभावमें पापग्रह हों तो पित्तरोग से मृत्यु कहे ॥ ८७ ॥ चन्द्रमा या गुरु जलचर राशिमें होकर अष्टममें हो उसे पापग्रह देखते हों तो क्षय रोग से मृत्यु कहे ॥ ८८ ॥ अष्टमस्थानमें शुक्र हो उसे पापग्रह देखते हों तो वातरोगसे वा क्षयरोगसे वा प्रमेहसे मृत्यु कहे ॥ ८९ ॥ सूर्यके स्थानमें बुध हो उसे पापग्रह देखते हों तो त्रिदोषसे वा ज्वररोगसे मृत्यु कहे॥९०॥ मृत्युस्थानमें राहु हो उसे पापग्रह देखता हो तो पिटकसे वा गर्मरोगसे वा सर्पसे मृत्यु होवे ॥ ९१ ॥ राहु ८ वेंमें प्राप्त हो पापग्रह उसको देखता हो तो मसूरिकादि रोगसे वा पित्तरोग से मृत्यु कहे ॥ ९२ ॥ ॥ ८७ ॥ ॥ ८८ ॥ कुण्डली ॥ ८७ ॥

  • तनु (१२): ल.
  • धन (१): मं. श. रा.
  • सहज (२)
  • सुख (३)
  • सुत (४)
  • रिपु (५)
  • जाया (६)
  • मृत्यु (७): के. सू.
  • धर्म (८)
  • कर्म (९)
  • आय (१०)
  • व्यय (११)
  • फल: पित्तरोगान्मरणम् कुण्डली ॥ ८८ ॥
  • तनु (५): ल.
  • धन (४)
  • सहज (३)
  • सुख (२)
  • सुत (१)
  • रिपु (१२): वृ. चं.
  • जाया (११)
  • मृत्यु (१०)
  • धर्म (९)
  • कर्म (८): सू. मं.
  • आय (७)
  • व्यय (६): श.
  • फल: क्षयरोगान्मरणम् ॥ ८९ ॥ ॥ ९० ॥ कुण्डली ॥ ८९ ॥
  • प्रथम भाव (लग्न): ल.
  • चतुर्थ भाव: मं.
  • सप्तम भाव: सू.
  • अष्टम भाव: शु.
  • द्वादश भाव: श.
  • फल: वात-क्षय-प्रमेहान्मरणम् कुण्डली ॥ ९० ॥
  • प्रथम भाव (लग्न): ल.
  • चतुर्थ भाव: ५ बु. र.
  • सप्तम भाव: श.
  • दशम भाव: मं.
  • फल: त्रिदोषान्मरणम्