जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआयुर्दायाध्यायः ॥ ५ ॥ १५१ पापग्रहेण संदृष्टे क्षयरोगान्मृतिं वदेत् ॥ ८८ ॥ अष्टमस्थानगे शुक्रे पापग्रहेनरीक्षिते । वातरोगात्क्षयाद्वाऽपि प्रमेहाद्वा मृतिं वदेत् ॥ ८६ ॥ सूर्यस्थानगते सौम्ये पापग्रहेनरीक्षिते । त्रिदोषान्मरणं विन्द्याज् ज्वररोगेण वा वदेत् ॥ ६० ॥ मृत्युस्थानगते राहौ पापग्रहेनरीक्षिते । पिटकाद्युष्णरोगाद्वा सर्पदोषान्मृतिर्भवेत् ॥ ६१ ॥ पराभवगते राहौ पापग्रहेनरीक्षिते । मसूरिकादिरोगाद्वा पित्तभ्रंशान्मृतिं वदेत् ॥ ६२ ॥ सरलार्थः श्लोकाः ॥ ८७-६२ ॥ अष्टमस्थानमें निर्बल सूर्य हो वा निर्बल मंगल हो, धनभावमें पापग्रह हों तो पित्तरोग से मृत्यु कहे ॥ ८७ ॥ चन्द्रमा या गुरु जलचर राशिमें होकर अष्टममें हो उसे पापग्रह देखते हों तो क्षय रोग से मृत्यु कहे ॥ ८८ ॥ अष्टमस्थानमें शुक्र हो उसे पापग्रह देखते हों तो वातरोगसे वा क्षयरोगसे वा प्रमेहसे मृत्यु कहे ॥ ८९ ॥ सूर्यके स्थानमें बुध हो उसे पापग्रह देखते हों तो त्रिदोषसे वा ज्वररोगसे मृत्यु कहे॥९०॥ मृत्युस्थानमें राहु हो उसे पापग्रह देखता हो तो पिटकसे वा गर्मरोगसे वा सर्पसे मृत्यु होवे ॥ ९१ ॥ राहु ८ वेंमें प्राप्त हो पापग्रह उसको देखता हो तो मसूरिकादि रोगसे वा पित्तरोग से मृत्यु कहे ॥ ९२ ॥ ॥ ८७ ॥ ॥ ८८ ॥ कुण्डली ॥ ८७ ॥
- तनु (१२): ल.
- धन (१): मं. श. रा.
- सहज (२)
- सुख (३)
- सुत (४)
- रिपु (५)
- जाया (६)
- मृत्यु (७): के. सू.
- धर्म (८)
- कर्म (९)
- आय (१०)
- व्यय (११)
- फल: पित्तरोगान्मरणम् कुण्डली ॥ ८८ ॥
- तनु (५): ल.
- धन (४)
- सहज (३)
- सुख (२)
- सुत (१)
- रिपु (१२): वृ. चं.
- जाया (११)
- मृत्यु (१०)
- धर्म (९)
- कर्म (८): सू. मं.
- आय (७)
- व्यय (६): श.
- फल: क्षयरोगान्मरणम् ॥ ८९ ॥ ॥ ९० ॥ कुण्डली ॥ ८९ ॥
- प्रथम भाव (लग्न): ल.
- चतुर्थ भाव: मं.
- सप्तम भाव: सू.
- अष्टम भाव: शु.
- द्वादश भाव: श.
- फल: वात-क्षय-प्रमेहान्मरणम् कुण्डली ॥ ९० ॥
- प्रथम भाव (लग्न): ल.
- चतुर्थ भाव: ५ बु. र.
- सप्तम भाव: श.
- दशम भाव: मं.
- फल: त्रिदोषान्मरणम्