जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 588 में से
संदर्भ में पढ़ें१७४ सटीकजातकपारिजाते-
कुण्डली रेका ३ एवं रेका ४
+-----------------------------------+-----------------------------------+
| \ ३ / \ / \ १ / \ | \ २ / \ / \ १ / \ चं. १२|
| \ / \ २ / \ / \ | \ / \ ३ / \ रा. / \ |
| \ / \ / \ / १२ \ | \ / \ / \ / ११ \ |
| ४ \ / \ / \ / \| ४ \ / \ / \ / \|
|-----+ +---------+ |-----+ +---------+ |
| | | ११ | | | १० |
| ५ | रेका ३ | |र.श.५| रेका ४ | |
| | | | | | |
|-----+ +---------+ |-----+ +---------+ |
|६श.शु| / \ / \ १० /|शु.बु.६| / \ ७ मं. / \ ८ /|
| / \ ७ / \ ८ / \ / | / \ ६ / \ के. / \ / |
| / \ / \र. बृ./ \ ९/ | / \ / \ / \बृ. ८/ |
+-----------------------------------+-----------------------------------+
चतुर्थेश अष्टमेशसे युक्त होकर षष्ठेशसे देखा जाता हो तो रेका योग होता है ! दशमेश ५ वें भावमें हो और लग्नेश नीचमें हो तो रेकायोग होता है । यदि शुभग्रह ८, ६, १२ भावोंमें हों, पापग्रह केन्द्र और त्रिकोणमें हों और लाभेश निर्बल हो तो भी रेका योग होता है ॥ २२ ॥ होरेशः खलसंयुतः सित गुरू चास्तं गतौ तद्वदेद् बन्धुस्थानपतिः शुभेतरयुतश्चास्तं गतो रेकदः ॥ भाग्यस्थानपतौ विकर्तनकरच्छन्ने विलग्नाधिपे नीचस्थे धनपे च नीचगृहगे रेखाभिधानो भवेत् ॥ २३ ॥ होरेशो=जन्मलग्नेशः खलेन = केनचित्पापग्रहेण संयुतो भवेत्, सितगुरू = शुक्रबृह- स्पती चास्तंगतौ = सूर्ययुतौ भवेतां तदा तद्वदेदर्थात् रेकायोगं ब्रूयादिति ।
कुण्डली रेका ५
+-----------------------------------+
| \र.शु.४बृ./ \ / \ २ / \ |
| \ / \बु. ३ श./ \ / \|
| \ / \ / \ / १ \|
| ५ \ / \ / \ / |
|-----+ +---+ +-----|
| | | |
| ६ | रेका ५ | १२ |
| | | |
|-----+ +---+ +-----|
| | / \ / \ ११ |
| ७ / \ ८ / ९ \ / \ |
| / \ / \ / \१०|
+-----------------------------------+
बन्धुस्थानपतिश्चतुर्थभावेशः शुभेत- रयुतः = पापग्रहसंयुक्तोऽस्तंगतश्च यदि भवेत्तदा रेकदो भवति । ईदृग्योगोऽपि रैफाख्य इति । अथ च भाग्यस्थानपतौ = नवमभा- वेशे = विकर्तनकरच्छन्नेऽर्थात्सूर्येण स- हास्तं गते, विलग्नाधिपे = लग्नेशे नीच- स्थे = स्वनीचराशि गते, धनपे च = द्वितीयभावेशे च नीचगृहगे = स्वनीचराशि गते रेखाभिधानो रेकानामको योगो भवेत् ॥२३॥
कुण्डली रेका ६ एवं रेका ७
+-----------------------------------+-----------------------------------+
| \ ४ / \ / \ २ / \ | \ ४ / \ / \ २ / \ |
| \ / \ ३ / \ / \ | \ / \ ३ / \ / \ |
| \ / \ / \ / १ \ | \ / \ / \ / १ \ |
| ५ \ / \ / \ / \| ५ \ / \ / \ / \|
|-----+ +---------+ |-----+ +---------+ |
| | | | | | |
| ६ | रेका ६ | १२ | ६ | रेका ७ | १२ बु. |
| | | | | | |
|-----+ +---------+ |-----+ +---------+ |
| | / \ / \ ११ /| | / \ / \ ११ /|
| ७ / \ ८ / \ ९ / \ / | ७ / \ ८ / \ ९ र. / \ / |
| / \ / \ /बृ.१०\ / | / \ / \ श. / \१०/ |
| / \ / \ / मं. र.\/ | / \ / ८ के. \ / \/ |
+-----------------------------------+-----------------------------------+
लग्नेश पापग्रहकें साथ हो शुक्र और गुरु अस्त हों तो 'रेका' योग होता है । चतुर्थभावका स्वामी पापग्रहके साथ होकर अस्त होवे तो 'रेका' योग होता है ।