भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

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द्वय्यादिग्रहयोगाध्यायः ॥ ८ ॥ २७६ यदि केतु रन्ध्र (अष्टम) गृहमें हो तो जातक परद्रव्य-परस्त्रीमें रत हो, रोगी, दुरा- चारी, विशेष लोभी हो। यदि शुभ ग्रह उसे देखते हों तो धनी तथा दीर्घायु हो ॥८५॥ अथ नवमस्थग्रहफलम्। आदित्ये नवमस्थिते पितृगुरुद्वेषी विधर्माश्रित- श्चन्द्रे पैत्रिकदेवकार्यनिरतस्त्यागी गुरुस्थे यदा। भूसूनौ यदि पित्र्यनिष्टसहितः ख्यातः शुभस्थौनगे सौम्ये धर्मगते तु धर्मधनिकः शास्त्री शुभाचारवान् ॥ ८६ ॥ ज्ञानी धर्मपरो नृपालसचिवो जीवे तपःस्थानगे विद्यावित्तकलत्रपुत्रविभवः शुक्रे शुभस्थे सति । मन्दे भाग्यगृहस्थिते रणतलख्यातो विदारो धनी भाग्यस्थे भुजगे तु धर्मजनद्वेषी यशोवित्तवान् ॥ ८७ ॥ केतौ गुरुस्थानगते तु कोपी वाग्मी विधर्मी परनिन्दकः स्यात् । शूरः पितृद्वेषकरोऽतिदम्भाचारो निरुत्साहरतोऽभिमानी ॥८८॥ सरलार्थैस्त्रिभिः पद्यैरत्र नवमभावे ग्रहाणां फलानि परिकीर्त्तितानि ॥ ८६-८८ ॥ सूर्य नवम भावमें स्थित हो तो पिता-गुरुका द्वेषी, विधर्मके आश्रय रहनेवाला हो। यदि चन्द्रमा नवम भावमें हो तो पितृ कार्य (तर्पण-श्राद्ध) देवकार्य (सन्ध्या-पूजा-जप- यज्ञ) में युक्त और दानी हो। यदि मङ्गल नवम भावमें हो तो पिताका अनिष्ट करने वाला, और विख्यात हो। बुध धर्म (नवम) भावमें हो तो धर्मका धनिक, शास्त्री, और शुभ आचारवान् होवे ॥ ८६ ॥ बृहस्पति नवमें भावमें हो तो ज्ञानी धर्ममें तत्पर, राजाका मन्त्री हो। शुक्र नवम भावमें हो तो विद्या-धन-स्त्री-पुत्रसे युक्त हो। शनि भाग्यगृह (नवम) में हो तो रणमें विख्यात, बिना स्त्रीवाला, और धनी हो। नवम भावमें राहु हो तो धार्मिक जनोंका वैरी, और यशस्वी हो ॥ ८७ ॥ केतु नवम भावमें हो तो क्रोधी, वाचाल, अधर्मी, परनिन्दक, वीर, पिताका वैरी, विशेष दम्भज्ञी, आलस्यमें लीन और अभिमानी हो ॥ ८८ ॥ अथ दशमस्थग्रहफलम्। मानंस्थिते दिनकरे पितृवित्तशील-विद्यायशोबलयुतोऽवनिपालतुल्यः। चन्द्रो यदा दशमगो धनधान्यवस्त्र-भूषावधूजनविलासकलाविलोलः॥८६॥ खेपूरणस्थेऽवनिजे तु जातः प्रतापवित्तप्रबलप्रसिद्धः। व्यापारगे चन्द्रसुते समस्त-विद्यायशोवित्तविनोदशीलः ॥ ६० ॥ सिद्धारम्भः साधुवृत्तः स्वधर्मी विद्वानाढ्यो मानगे चामरेड्ये। शुक्रे कर्मस्थानगे कर्षकाच्च स्त्रीमूलाद्वा लब्धवित्तो विभुः स्यात् ॥ ६१ ॥ मन्दे यदा दशमगे यदि दण्डकर्ता मानी धनी निजकुलप्रभवश्च शूरः। चोरक्रियानिपुणबुद्धिरतो विशीलो मानं गते फणिपतौ तु रणोत्सुकः स्यात् ॥६२॥ सुधीर्बली शिल्पविदात्मबोधी जनानुरागी च विरोधवृत्तिः ॥ कफात्मकः शूरजनाग्रगण्यः सदाऽटनः कर्मगते च केतौ ॥ ६३ ॥ सुखाबगमार्थकैः पञ्चभिः श्लोकैर्दशमे भावे ग्रहाणां फलान्यत्रोक्तानि ॥ ८९-९३ ॥ सूर्य दशम भावमें हो तो पिताका धन और शील प्राप्त हो, विद्या व यशसे युक्त हो और राजाके सदृश हो । यदि चन्द्रमा दशम भावमें हो तो धन-धान्य-वस्त्र-भूषणसे युक्त, स्त्रियों का विलासी, कला जाननेवाला हो ॥ ८६ ॥