जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ सटीकजातकपारिजाते- शुक्र अपनी उच्च राशिमें हो तो स्त्री-संगीत-नृत्य का बड़ा प्रेमी हो । शनि हो तो ग्राम-पुर-बाजारका राजा और कुमारी स्त्रीसे भोग करनेवाला हो । राहु हो तो चोरोंका मालिक, कुलश्रेष्ठ, कुकर्मी तथा धनी हो । केतु हो तो चोरोंसे प्रेम रखनेवाला, नीच राजाका प्रिय हो ॥ १०१ ॥ एक भी उच्च स्थानी ग्रह मित्र ग्रहसे दृष्ट हो मित्रसे युक्त हो तो वह राजा, पूज्य, धनादियुक्त बालकको पैदा करता है, अर्थात् इस प्रकारके योगमें उत्पन्न होनेवाला, धनयुक्त पूज्य राजा होता है ॥ १०२ ॥ एक ग्रह उच्चके बलवान् होनेपर उत्पन्न हो तो वह धन्य और धनी हो । दो ग्रह हों तो सामन्त ( छोटा राजा ), तीन ग्रह हों तो राजा हो । बलवान् चार ग्रह उच्चके केन्द्रमें हों तो महाराजा हो । पांच ग्रह उच्चके हों तो चक्रवर्ती हो ॥ १०३ ॥ अथ मूलत्रिकोणगतफलम् । मार्तण्डे यदि मूलकोणगृहगे जातो धनी वन्दित- श्चन्द्रे वित्तसुखान्वितश्च रुधिरे कोपी दयावर्जितः । ताराजे धनिको जपी, सुरगुरौ भोगी नृपालप्रियः शुक्रे ग्रामपुराधिपस्तरणिजे शूरस्तु, राहौ धनी ॥ १०४ ॥ इदानीं स्वस्वमूलत्रिकोणे ग्रहाणां फलान्युच्यन्ते । श्लोकः स्पष्टार्थ इति ॥ १०४ ॥ यदि सूर्य स्वमूलत्रिकोण गृह ( सिंह ) में हो तो धनी तथा वन्दनीय हो । चन्द्रमा हो तो धन सुखसे युक्त हो । मङ्गल अपने मूलत्रिकोणमें हो तो क्रोधी और निर्दयी हो । बुध हो तो धनी और तपस्वी हो । बृहस्पति हो तो भोगी राजप्रिय हो । शुक्र हो तो ग्राम-पुरका स्वामी हो । शनि हो तो वीर और राहु हो तो धनी हो ॥ १०४ ॥ अथ स्वक्षेत्रस्थफलम् । स्वर्क्षे भास्वति चारुमन्दिरदुराचारोऽग्रकामी, विधौ तेजोरूपधनी, कुजे कृषिवलख्यातो बुधे पण्डितः । जीवे काव्यकलागमश्रुतपरः, शुक्नो मनस्वी धनी, मन्दे चण्डपराक्रमो गतसुखी, राहौ यशोवित्तवान् ॥ १०५ ॥ स्वजातिकल्पा