भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

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स्त्रीजातकाध्यायः ॥१६॥ ४५१ दोनों प्रकारके ग्रह हों तो मिश्र फल हो। केवल शुभग्रह हों तो शुभ लक्ष्मीसे युक्ता हो। पंचमेश षष्ठ स्थानमें हो, शत्रु स्थान (६) का स्वामी लग्नमें हो, तो शस्त्रसे मृत्यु हो ॥२९॥ क्रूरग्रहैरस्तगतैः समस्तैर्विलग्नराशेर्विधवा भवेत्सा। मिश्रैः पुनर्भूस्नेिह जातकन्या पत्युज्झिता हीनबलैरसद्भिः ॥ ३० ॥ श्लोकोऽयं स्पष्टार्थः १९ तमश्लोकपूर्वार्द्धस्य समानार्थकश्चेति ॥ ३० ॥ लग्नसे सप्तम भावमें सब पापग्रह हों तो विधवा हो। मिश्रग्रह ७ वें हों तो इस योग में उत्पन्न कन्या पुनर्भू हो। पापग्रह बलसे हीन हों तो उसका पति उस स्त्रीको त्याग दे ॥ स्त्रीजन्मग्नान्मदगे शशाङ्के शुक्रारयुक्ते यदि जातकन्या। सा पत्यनुज्ञापरगामिनी स्यात्सौरारभांशोपगते तथैव ॥ ३१ ॥ स्पष्टार्थः। १९ तमश्लोकोत्तरार्द्धार्थतुल्यश्चेति ॥ ३१ ॥ स्त्रीके जन्म लग्नसे सप्तम स्थानमें चन्द्रमा हो, शुक्र और मंगलसे युक्त हो तो वह स्त्री पतिकी आज्ञासे दूसरे पुरुषसे विहार करे। पूर्वोक्त चन्द्रमा यदि शनि या मंगलके नवांश में हो तो भी यही फल होवे ॥ ३१ ॥ सौरारभांशोपगतग्रहेषु शुक्रेन्दुयुक्तेष्वशुभेक्षितेषु। जाता कुलाचारगुणैर्विहीना मात्रा च साकं व्यभिचारिणी स्यात् ॥ ३२ ॥ सौरारेति । यत्र तत्र भावे सौरारभांशोपगतग्रहेषु = शनिमाङ्गल्योर्भानि मेषवृश्चिकम- करकुम्भास्तेषां नत्रांशेषूपगतेषु ग्रहेषु, शुक्रेन्दुभ्यां युक्तेषु अशुभेन = पापग्रहेण, ईक्षितेषु । एतदुक्तं भवति । शुक्रचन्द्राभ्यां युक्ताः केचिदन्ये त्र्यधिका ग्रहा भौमशनिभांशे यत्र तत्र गताः केनचित्पापेन दृष्टाश्च भवेयुस्तदा जाता स्त्री कुलाचारगुणैर्विहीना तथा मात्रा साकं व्यभिचारिणी च स्यात् । अस्मिन्योगे जाता न यावत्कन्यैव कुकर्मकर्त्री भवत्यपि तु तन्मा- ताऽपि दुराचारिणी भवतीति ॥ ३२ ॥ शनि और मंगलकी राशि या नवांशमें ग्रह प्राप्त हों शुक्र और चन्द्रमासे युक्त तथा पाप ग्रहसे दृष्ट हो तो कन्या कुल आचारसे हीन हो और माताके सहित व्यभिचारिणी हो ॥३२॥ क्षितितनयनवांशे लग्नतः सप्तमस्थे दिनकरबुधदृष्टे व्याधियोनिः प्रजाता। शुभकरनबभागे सप्तमस्थानसंस्थे सुभगसुतवती सा चान्यथा दुर्भगा स्यात् ॥३३॥ सरलार्थः श्लोकोऽयमिति ॥ ३३ ॥ लग्नसे सप्तम भावमें मंगलका नवांश हो, सूर्य और बुध देखते हों तो योनिमें व्याधि हो। शुभग्रहका नवांश सप्तम भावमें हो तो सुभगा और पुत्रवाली हो, अन्यथा दुर्भगा हो ॥ कामासक्तमनस्विनी च विधवा पापद्वये सप्तमे पश्चात्स्वामिवधं करोति कुलटा पापत्रये चास्तगे। राजामात्यवराङ्गना यदि शुभे भौमं गते कन्यका सौरस्थे तु शुभत्रये गुणवती राज्ञी भवेद् भूपतेः ॥ ३४ ॥ सरलार्थः। स्त्रीजातके सप्तमे भावे सपापेऽशुभं फलम्। सप्तमे तु शुभग्रहे शुभं फलमिति भावार्थः ॥ ३४ ॥ दो पापग्रह सप्तममे हों तो काममें आसक्ता, मनस्विनी और विधवा हो। तीन पापग्रह सप्तममें हों तो कुछ समयके बाद पतिको मारे और कुलटा होवे। यदि सप्तममें शुभग्रह हो तो राजाके नौकरकी स्त्री हो। सातवें स्थानमें यदि तीन शुभग्रह हों तो गुणवती और राजाकी रानी होवे ॥ ३४ ॥ अन्योन्यांशगतौ सितार्कतनयावन्धोन्यदृष्टौ तु वा कुम्भे चाष्टमभागजातवनिता कामाभितप्ता भवेत्।