भारतकोश
जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

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दशाफलाध्यायः ॥१८॥ ५४१ आत्मवर्गान्मनोदुःखं रवौ भौमदशान्तरे ॥ ६१ ॥ मं. चं. — नाना वित्त सुखं वस्त्रमुक्तामणिविभूषणम् । निद्रालस्यमथोद्वेगं चन्द्रे भौमदशान्तरे ॥ ६२ ॥ विशेष: — भूनन्दनस्य पाकादौ मानहानिर्धनक्षयः । मध्ये नृपाग्निचोराद्यैर्भीतिश्चान्ते तथा भवेत् ॥ ६३ ॥ उच्चस्थितस्य धरणीतनयस्य पाके नीचांशगस्य मरणं सुतसोदराणाम् । नीचे तु तुङ्गभवनांशगतस्य दाये कृष्यादिभूमिधनधान्यसुखं वदन्ति ॥ ६४॥ इदानीं कुजदशायां सर्वेषामन्तर्दशाफलान्याह । तत्र भौमो यदि स्वकीयोच्च-(मकर) गतः स्वनिच-(कर्क) राशिनवांशगतो भवेत्तदा तद्दशायां सुतसोदराणां (पुत्राणां भ्रातॄणां च) मरणं वाच्यम् । तथा नीच-(कर्क) राशौ तुङ्गनवांश-(मकरनवांश) गतस्य भौमस्य दाये कृष्यादिभूमिधनधान्यसुखं वदन्ति । एवं तारतम्येनैव सर्वेषां ग्रहाणामपि स्थितिवशै- नान्तर्दशाफलान्यप्यूहनीयानि ॥ ८४-९४ ॥ मंगलकी दशामें मंगलकी अन्तर्दशा हो तो गर्मी विशेष हो, मित्रसे वैर हो, भ्रातृपीडा, राजभय और समस्त कार्य-धनका नाश हो ॥ ८४ ॥ मंगलकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा हो तो राजा और चोरका भय हो, धन-धान्यका नाश हो, दुष्ट कार्योंकी सिद्धि हो ॥ ८५ ॥ मंगलकी दशामें बृहस्पतिकी अन्तर दशा हो तो ब्राह्मणसे धन लाभ, भूमि लाभ, आरोग्यता, पूजन, जय और सौख्य हो ॥ ८६ ॥ मंगलकी दशामें शनिकी अन्तर्दशा हो तो बहुत दुःख व्याधिकी ज्ञान, शत्रु-चोर- राजासे भय और धन नाश होता है ॥ ८७ ॥ मंगलकी दशामें बुधकी अन्तर्दशा हो तो वैश्यवर्गसे धन प्राप्ति हो, गृह-गो-धन- सम्पत्ति, बन्धुत्राधा और मनमें क्लेश हो ॥ ८८ ॥ मंगलकी दशामें केतुकी अन्तर्दशा हो तो कुक्षि रोगसे सन्ताप, बन्धु-सहोदर भाई को पीडा और दुष्ट मनुष्य से शत्रुता होती है ॥ ८९ ॥ मंगलकी दशामें शुक्रकी अन्तर दशा हो तो स्त्री-भूषण प्राप्ति हो, वस्त्र लाभ, बन्धु वर्ग, भोजनसे वैर और उनकी संगत हो ॥ ९० ॥ मंगलकी दशामें सूर्यकी अन्तर दशा हो तो अपवाद, गुरुसे वैर, कलह, व्याधिपीडा, आत्मवर्गसे मनमें दुःख हो ॥ ९१ ॥ मंगलकी दशामें चन्द्रमाकी अन्तर्दशा हो तो नाना प्रकारके धनका सुख, वस्त्र-मोती- मणि-विभूषणकी प्राप्ति हो । निद्रा, आलस्य और उद्वेग हो ॥ ९२ ॥ मंगलकी दशाके आदिमें मान हानि, धन नाश, मध्यमें तथा अन्त्यमें राजा चोर और अग्निसे भय हो ॥ ९३ ॥ उच्च राशिमें स्थित नीच नवांशमें प्राप्त मंगलकी दशामें पुत्र-सहोदर भाईकी मृत्यु हो । नीचराशिमें उच्चांशमें स्थित हो तो कृषि आदि भूमि-धन-धान्य-सुख होना विद्वान् कहते हैं ॥ ९४ ॥ अथ कुजदशायां सर्वेषामन्तर्दशाचक्रम् ।

मं. मं.मं. रा.मं. बृ.मं. श.मं. बु.मं. के.मं. शु.मं. सू.मं. चं.योगः
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