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जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)

Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary

वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished588 पृष्ठ

( काशी संस्कृत ग्रन्थमाला ४६ ) श्रीमच्छतानन्द विरचिता भास्वती श्रीमातृप्रसाद ( दैवज्ञभूषण ) पाण्डेयेनकृता ‘छात्रबोधिनी' संस्कृतभाषाटीकासहिता आचार्यरामजन्ममिश्रेण संशोध्य टिप्पण्यादिभिरलंकृता श्रीमान् आचार्य शतानन्द द्वारा विरचित भास्वती करण ग्रन्थ है। इसका निर्माण ई० सन् १०९९ में हुआ था। आचार्य वाराह मिहिर के सूर्य-सिद्धान्त के आधार पर जो सम्प्रति पञ्चसिद्धान्तिका में उपलब्ध है, बनी है। पहले इस ग्रन्थ का बहुत अधिक प्रयोग था। उस समय इसकी अनेक संस्कृत टीकायें मिलती थीं किन्तु समय ने विशिष्ट गुणयुक्त अत्युपयोगी इस ग्रन्थ को भी लुप्तप्रायः कर दिया। इसमें ग्रहों का क्षेपक शक १०२१ की स्पष्ट मेष-संक्रान्ति काल (गुरुवार) का है। इसमें अहर्गण के आधारपर ग्रहों को स्पष्ट करने की विधि नहीं है वरन् ग्रहों की वार्षिक गति के अनुसार है जिससे गणना करने में बड़ी सुविधा है। आचार्य ने शतांश प्रणाली से गणित का काम किया है अर्थात् राशि अंश कला विकला लिखने के स्थान पर राशि के सौवें भाग में या नक्षत्र के सौवें भाग में ग्रहस्थिति बतायी है। जैसे चन्द्रमा की एक वर्ष की गति ९७० ५/६ नक्षत्र शतांशों में बतायी गई है जिसका अर्थ है— ९७० ५/६ / १०० नक्षत्र = (९७० ५/६ / १००) x ८०० कला = ७७६६ २/३ कला = ४ राशि १२ अंश ४६ कला ४० विकला इसी प्रकार शनि का क्षेपक ५१४ शतांश राशि है जिसका अर्थ दशमलव भिन्न में ५.१४ राशि हुआ। इस प्रकार आधुनिकतम गणितोपयुक्त यह ग्रन्थ शीघ्र प्रकाश में आ रहा है। ( १९८४ ) ४०-०० प्राप्तिस्थान—चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी-२२१००१