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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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ज्ञानयोग -

आकाश अनन्त चँदोया, शय्या धरती तृण-शोभित,
रहने के लिए तुम्हारे यह विश्वगेह है निर्मित;
जैसा भोजन मिल जाए, सन्तोष उसी पर करना;
सुस्वादु स्वाद-विरहित मे कुछ भी मत भेद समझना;
शुद्धात्मरूप का जिसमे सद् ज्ञानालोक चमकता,
कुछ खाद्य पेय क्या उसको अपवित्र कहीं कर सकता ?
उन्मुक्त स्वतंत्र प्रवाहित तुम नदी तुल्य बन जाओ,
छेड़ो यह तान अनूठी, सानन्द गीत यह गाओ—

ॐ तत् सत् ॐ.

ज्ञानी विरले, अज्ञानी कर घृणा हँसेगे तुम पर;
हे हे महान्, तुम उनको मत लखना आँख उठा कर ।
स्वाधीन मुक्त तुम, जाओ, पर्यटन करो पृथ्वी पर,
अज्ञान-गर्त-पतितों का उद्धार करो तुम सत्वर;
माया-आवरण-तिमिर मे जो पड़े वेदना सहते,
तुम उन्हे उबारो जाकर, जो मोह-नदी मे बहते ।
विचरो जन-हित-साधन को स्वच्छन्द मुक्त तुम अविजित
दुख की पीड़ा से निर्भय, सुख-अन्वेषण से विरहित;
सुख दुख के द्वन्द्व-स्थल के तुम परे महात्मन्, जाओ;
गाओ गाओ संन्यासी, उच्चस्वर से तुम गाओ—

ॐ तत् सत् ॐ.

इस विधि से छीजू दिनोंदिन, है कर्म स्वीय बल खोता;
बन्धन छुटता आत्मा का, फिर उसका जन्म न होता;