ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास ११५
अतः वे हमारी तुम्हारी अपेक्षा सहस्रगुना दुःख-सुख का बोध करते हैं। कुत्ता या व्याघ्र जिस स्फूर्ति और लगन के साथ भोजन करते हैं, उस तरह कौन मनुष्य कर सकता है ? इसका कारण है कि हमारी समस्त कार्यों की प्रवृत्ति इन्द्रियो मे नहीं है, बुद्धि में है, आत्मा मे है। किन्तु कुत्ते की इन्द्रियों मे ही प्राण पड़े रहते है, वह इन्द्रियसुख के लिये उन्मत्त हो जाता है, वह जितने आनन्द के साथ इन्द्रियसुख का उपभोग करता है, मनुष्य उतना नही कर सकता; और जैसा उसका यह सुख है उसी परिमाण मे उसका दुःख भी है।
जितना सुख है उतना ही दुःख है। यदि मनुष्येतर प्राणी इतनी तीव्रता से सुख की अनुभूति करते हैं तो यह भी सत्य है कि उनके दुःख की अनुभूति भी उतनी ही अधिक तीव्र होगी—मनुष्य की अपेक्षा सहस्रगुनी तीव्र होगी, परन्तु फिर भी उन्हे मरना होगा ! तो फिर मरने मे भी उन्हे मनुष्य की अपेक्षा सहस्रगुना कष्ट होगा । फिर भी हमे उनके कष्ट की चिन्ता न करते हुये उन्हे मारना पडता है। यही तो माया है; और यदि हम मान ले कि ईश्वर हमारी ही तरह का एक व्यक्ति है ( सगुण ) जिसने यह सृष्टि रची है तो ये सब सिद्धान्त और व्याख्यायें जो यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि बुराई में ही भलाई छिपी रहती है, ये सब पर्याप्त नहीं हैं। उपकार चाहे सैकड़ो हो किन्तु अपकारों से उपकार क्यों होंगे ? इसे सिद्धान्त के अनुसार मै यदि अपनी इन्द्रियों के सुख के लिये दूसरों का गला काटूँ तो कोई बुराई नहीं है। अतएव यह युक्ति ठीक नही मालूम होती। बुराई मे से भलाई क्यो निकलेगी ? इस प्रश्न का उत्तर देना होगा। किन्तु इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है; यह बात भारतीय दर्शन को माननी पड़ी।