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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

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माया और मुक्ति . १२९

अवश्य, किन्तु इसमे यह एक विपत्ति है कि अन्त मे हताश होकर सब चेष्टाये छोड़ देनी पडती है। जो लोग कहते है—" संसार को जैसा देखते हो वैसा ही ग्रहण करो; जितनी दूर तक स्वच्छन्द रह सकते हो, रहो 'समस्त दुःख, कष्ट आने पर भी सन्तुष्ट रहो; आघात होने पर भी कहो कि यह आघात नहीं; पुष्पवृष्टि है; दास के समान परिचालित होने पर भी कहो—'मै मुक्त हूँ, स्वाधीन हूँ' दूसरों के तथा अपनी आत्मा के सम्मुख दिन रात मिथ्या बोलो, क्योंकि संसार में रहने का, जीवित रहने का यही एक मात्र उपाय है, "—ऐसे लोग बाध्य होकर ही अन्त मे ऐसा करते है। इसी को पक्का सांसारिक ज्ञान कहते है और इस उन्नीसवीं शताब्दी में यह ज्ञान जितना साधारण है उतना साधारण कभी भी नहीं था; इसका कारण यही है कि लोग इस समय जो चोटे खा रहे है ऐसी चोटें उन्होने पहले कभी नहीं खाई थीं, प्रतिद्वन्द्विता भी इतनी तीव्र पहले कभी नहीं थी; इस समय मनुष्य अपने दूसरे भाइयों के प्रति जितना निष्ठुर है उतना पहले कभी नही था, और इसीलिये आज कल यह सान्त्वना दी जाती है। आज कल यह उपदेश ही अधिकतर दिया जाता है, किन्तु इस उपदेश से अब कोई फल नहीं होता; कभी भी नहीं होता। गले हुये शव को फूलो से ढक कर कब तक रखा जा सकता है। असम्भव कब तक चल सकता है ? एक दिन ये सब फूल उड जायेंगे, तब यह शव पहले से भी अधिक वीभत्स रूप मे दिखेगा। हमारा समस्त जीवन ही ऐसा है। हम अपने पुराने सड़े घाव को स्वर्ण के वस्त्र से ढक देने की चेष्टा कर सकते हैं किन्तु एक दिन आयेगा जब वह स्वर्णवस्त्र खिसक पड़ेगा और वह घाव अत्यन्त वीभत्स रूप मे हमारे सम्मुख प्रकाशित होगा। तब क्या कोई