ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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मै यह नही कहता कि यह दुर्बलता केवल इसी देश में (इंग्लैण्ड में) हैं—यह सभी देशों मे है और जैसी मेरे देश में है वैसी तो कहीं भी नहीं है—और यह बहुत-ही भयानक रूप मे है। इसीलिये अद्वैतवाद का प्रचार साधारण लोगों में कभी होने नहीं दिया गया। संन्यासी लोग अरण्य (वन) मे इसकी साधना करते थे, इसी कारण वेदान्त का एक नाम 'आरण्यक' भी था। अन्त मे भगवान की कृपा से बुद्ध देव ने आकर सर्व साधारण लोगों के बीच इसका प्रचार किया, उस समय समस्त जाति बौद्ध धर्म से जाग उठी। बहुत समय के बाद जब नास्तिकों ने समस्त जाति को ध्वंस करने की फिर चेष्टा की तब ज्ञानियों ने समझा कि भारत की नास्तिकता के अन्धकार को दूर करने के लिये एक मात्र उपाय यही धर्म है। दो बार इसने नास्तिकता से भारत की रक्षा की है। पहले, बुद्धदेव के आने से पूर्व नास्तिकता अति प्रवल हो उठी थी—योरोप अमेरिका के विद्वानो मे आजकल जैसी नास्तिकता है वैसी नहीं; वह इससे भी भयंकर नास्तिकता थी। मैं एक प्रकार का नास्तिक हूँ, कारण मेरा विश्वास है कि केवल पदार्थ का ही अस्तित्व है। आधुनिक वैज्ञानिक नास्तिक भी यही कहते है, किन्तु वे उसे 'जड़' नाम से पुकारते है और मैं उसे 'ब्रह्म' कहता हूँ। ये 'जड़वादी' नास्तिक कहते है, इसी 'जड़' से ही मनुष्य की आशा, भरोसा, धर्म सभी कुछ हैं। मै कहता हूँ, 'ब्रह्म' से ही सब कुछ हुआ है। मैं इस प्रकार की नास्तिकता की बात नहीं कह रहा हूँ, मै चार्वाको के मत की बात कह रहा हूँ—खाओ, पिओ, मौज उड़ाओ; ईश्वर, आत्मा या स्वर्ग कुछ भी नही है, धर्म कुछ धूर्त दुष्ट पुरोहितो की कल्पना मात्र है—यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।' इस प्रकार की नास्तिकता बुद्धदेव