ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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ही पडेगा; क्योकि हम जानते है कि बड़े वडे चिन्ताशील व्यक्ति भी कभी कभी वालकोचित बाते किया करते है। लोग जो कहते है कि ‘ऐसा कोई असंगत मत नहीं है जिसका समर्थन करने के लिये कोई दार्शनिक आगे नहीं बढता है’ यह बिलकुल सच है। पहली शका यह है कि हमे अपने जन्म-जन्मान्तर की बाते क्यो याद नही रहती है? इस पर यह पूछा जा सकता है कि क्या इसी जन्म की सव वीती घटनाओ को हम याद कर सकते है? तुम लोगों मे से कितने वचपन की घटनाओं को स्मरण कर सकते है? बचपन की कोई वात तुम नही याद कर सकते, फिर यदि स्मृति-शक्तियो के ऊपर अस्तित्व निर्भर रहे तो यह कहना पड़ेगा कि वचपन मे तुम्हारा अस्तित्व ही नहीं था, क्योकि उस समय की कोई बात तुम याद नही कर सकते हो। यह कहना वेकार है कि यदि हम स्मरण कर सके तभी हम पूर्वजन्म का अस्तित्व स्वीकार करने को तैयार है। क्या इसका कोई कारण है कि पूर्वजन्म की बाते हमारे स्मरण मे रहेगी ही? उम समय का मस्तिष्क भी बिलकुल नष्ट हो गया है एव एक नये मस्तिष्क की रचना हुई है। अतीतकाल के सस्कारों का जो समष्टिभूत फल है वही हमारे मस्तिष्क मे आया है—उसी को लेकर मन हमारे इस शरीर मे अवस्थित है।
मै अब जिस दशा मे हूँ वह मेरे अनत अतीतकाल के कर्म के परिणाम का फल है; किन्तु मुझे उस अतीत का स्मरण करने से क्या प्रयोजन? कुसस्कारो का ऐसा प्रभाव है कि जो लोग पुनर्जन्मवाद नहीं मानते वे ही फिर कहते है कि एक समय हम वन्दर थे; किन्तु फिर उन्हे उस मर्कट-जन्म का स्मरण क्यो नही है? इसके कारणो की