भारतकोश
ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

जगत्

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गिरा तो मनुष्य को असंतोष हुआ। इसके बाद मनुष्य ने क्रमश इसी प्रकार की कई घटनाएँ देखीं। श्रृंखला की तरह ये घटनाएँ एक दूसरे से बंधी हुई थी। यह शृंखला क्या थी ? वह शृंखला यह थी कि सभी सेब गिरते है। और इसीको उसने 'माध्याकर्षण' का नाम दिया। अतएव हमने देखा कि पहले की अनुभूतियाँ न रहने से कोई नई अनुभूति प्राप्त करना असंभव है, क्योकि उस नयी अनुभूति से तुलना करने के लिये कुछ भी नही मिल सकेगा। इसलिये कई यूरोपीयन् दार्शनिको का जो मत है कि 'पैदा होते समय बच्चा ससारशून्य मन लेकर आता है' यदि सच हो तो संसार से उसे संस्कारशून्य मन लेकर जाना पड़ेगा क्योंकि नयी अनुभूति के साथ मिलने के लिये उसने कोई सस्कार ही नहीं हैं। अतएव हमने देखा कि इस पूर्वसंचित ज्ञान-भाडार के बिना कोई नया ज्ञान प्राप्त करना असंभव है। वस्तुतः हम सभी को पूर्वसचित ज्ञान-भांडार अपने साथ लेकर आना पडा है। ऐसे ज्ञान के बिना जानने का और कोई दूसरा उपाय नहीं है। यदि हमे यहाँ पर वह ज्ञान नहीं मिला हो तो अवश्य ही हमने अन्य कहीं से उसे प्राप्त किया होगा। मृत्यु से हम सर्वदा डर जाते है, लेकिन क्यों ? मुर्गी का एक बच्चा जो अभी पैदा हुआ है, एक चील को आते देखकर भाग गया। उसने कहाँ से तथा कैसे सीखा कि चील मुर्गी के बच्चों को खा जाती है। इसका एक पुराना विश्लेषण है, किन्तु उसे हम सिर्फ विश्लेषण ही नहीं कह सकते। वह स्वाभाविक सस्कार (Instinct) कहा जाता है। मुर्गी के उस छोटे बच्चे मे कहाँ से मरने का डर आया ? अंडे से अभी अभी निकली बत्तक पानी के निकट आते ही क्यो कूद पडती है तथा तैरने लगती है ? वह तो पहले कभी तैरना नहीं जानती थी, न तो पहले उसने किसीको तैरते